For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

(बहरे रमल मुसम्मन मख्बून मुसक्कन

फाइलातुन फइलातुन फइलातुन  फेलुन.

२१२२     ११२२     ११२२    २२)

 

जब भी हो जाये मुलाक़ात बिफर जाते हैं

हुस्नवाले भी अजी हद से गुजर जाते हैं

 

देख हरियाली चले लोग उधर जाते हैं

जो उगाता हूँ उसे रौंद के चर जाते हैं

 

प्यार  है जिनसे मिला उनसे शिकायत ये ही

हुस्नवाले है ये दिल ले के मुकर जाते हैं

 

माल लूटें वो जबरदस्त जमा करने को

रिश्तेदारों के यहाँ शाम-ओ-सहर जाते हैं

 

घर बनाने को चले जो भी नदी को पाटें   

बाढ़ में बह के वही लोग बिखर जाते हैं  

 

बाढ़ जनता की मुसीबत है अफ़सरों  का मज़ा

उनके बिगड़े हुए हालात सुधर जाते है

 

प्यार से जब भी मिले प्यार जताया 'अम्बर'

क्यों ये कज़रारे नयन अश्क से भर जाते हैं

--इं० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'

Views: 1001

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 12, 2012 at 2:04pm

आदरणीय भाई जी, आपकी इस ग़ज़ल के मतले और उद्धृत शेरों पर ध्यान ही नहीं गया था, खूब मंथन हुआ था. अब बहुत कुछ सधा हुआ है. ओबीओ की यही तो खासियत है.

सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 2:02pm

आदरेया राजेश कुमारी जी,

आभारी हूँ कि आपने मतले को सकारात्मक दृष्टि से ही परखा ....

//माल लूटें वो जबरदस्त जमा करने को

रिश्तेदारों के यहाँ शाम-ओ-सहर जाते हैं-------चोर है क्या ?//

केवल चोर ही नहीं वरन डकैत हैं डकैत .........क्योंकि रिश्तेदारी का सीधा ताल्लुक स्विट्जरलैंड आदि से ही है .....

एक-एक शेर की समीक्षा करके दाद देने के लिए आपके प्रति हार्दिक धन्यवाद ! सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 1:51pm

आदरणीय अशोक जी,

आपके द्वारा की गयी सराहना के लिए हार्दिक आभार मित्रवर !

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 1:49pm

शरीफ साहब,

आपने मतले में जम के पहलू की बात की है ....

जैसा कि मैं भाई वीनस जी को स्पष्ट कर चुका हूँ .....कि 'पसर' जाने से हमारा तात्पर्य रुकने ओर टिक जाने से ही था परन्तु इसके द्विअर्थी होने की तरफ़ मैंने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया था.....अतः इसे सुधार कर 'बिफर' कर दिया है | हालाँकि इस ग़ज़ल को मैं बज़्म-ए-सुखन की नशिस्त में पढ़ चुका हूँ परन्तु आश्चर्य है कि इस ओर किसी ने भी इंगित नहीं किया  ! इसे इंगित करने के लिए आपका व वीनस  साहब का बहुत-बहुत शुक्रगुज़ार हूँ |

आप शायद अब  निराश न हों ...

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 1:38pm

आदरणीय भाई वीनस केसरी जी

'पसर' जाने से हमारा तात्पर्य रुकने ओर टिक जाने से ही था परन्तु इसके द्विअर्थी होने की तरफ़ मैंने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया था.....अतः इसे सुधार कर 'बिफर' कर दिया है | हालाँकि इस ग़ज़ल को मैं बज़्म-ए-सुखन की नशिस्त में पढ़ चुका हूँ परन्तु आश्चर्य है कि इस ओर किसी ने भी इंगित नहीं किया  ! इसे इंगित करने के लिए आपका व शरीफ साहब का बहुत-बहुत शुक्रगुज़ार हूँ | दोहों पर भी आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है !

अब यह मतला कुछ इस प्रकार से है ...

जब भी हो जाये मुलाक़ात बिफर जाते हैं

हुस्नवाले भी अजी हद से गुजर जाते हैं


आपसी बातचीत संबंधी व्यस्तता में हुए ध्यान भंग की वजह से आये हुए 'तकबुले रदीफ' को निम्न प्रकार से दूर कर दिया है ....

देख हरियाली चले लोग उधर जाते हैं

जो उगाता हूँ उसे रौंद के चर जाते हैं

प्यार  है जिनसे मिला उनसे शिकायत ये है

हुस्नवाले है ये दिल ले के मुकर जाते हैं

माल लूटें वो जबरदस्त जमा करने को

रिश्तेदारों के यहाँ शाम-ओ-सहर जाते हैं.....     वैसे यह शेर  का ताल्लुक स्विट्जरलैंड से है फिर भी  इस शेर की बेहतरी के लिए

                                                               कृपया  इस्लाह करें .....

प्यार से जब भी मिले प्यार जताया 'अम्बर'

क्यों ये कज़रारे नयन अश्क से भर जाते हैं         शायद किसी पश्चाताप के आँसू ही होंगे भाईजी .......

आप शायद अब  निराश न हों ....

इस गज़ल पर विस्तृत प्रतिक्रिया देने हेतु आपका दिली शुक्रिया .....


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 10:54am

वाह वाह वाह आदरणीय अम्बरीष भाई जी, बहुत ही प्यारी सी ग़ज़ल कही है. मतला-ए-सानी कमाल का बना है, बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 12, 2012 at 9:37am

जब भी हो जाये मुलाक़ात पसर जाते हैं

हुस्नवाले भी अजी हद से गुजर जाते हैं-------पहले फंसाना फिर पीछा छुड़ाना 

 

देख हरियाली चले लोग उधर जाते हैं

जो उगाता हूँ वहाँ रोज वो चर जाते हैं-------कोई चुम्बकीय आकर्षण होगा 

 

प्यार  है जिनसे मिला उनसे शिकायत कैसी

देख तिरछी सी नज़र हम भी सिहर जाते हैं---------प्यार में गिले शिकवे कैसे 

 

माल लूटें वो जबरदस्त जमा करने को

रिश्तेदारों के यहाँ शाम-ओ-सहर जाते हैं-------चोर है क्या ?

 

घर बनाने को चले जो भी नदी को पाटें   

बाढ़ में बह के वही लोग बिखर जाते हैं  ----वाह वाह प्रकृति का रोष तो झेलना ही पड़ेगा 

 

बाढ़ जनता की मुसीबत है अफ़सरों  का मज़ा

उनके बिगड़े हुए हालात सुधर जाते है----------बढ़िया कटाक्ष प्राकृतिक त्रासदी में हाथ सेंकते हैं अधिकारी 

 

प्यार से जब भी मिले प्यार जताया 'अम्बर'

क्यों ये कज़रारे नयन अश्क से भर जाते हैं---------कोई तो गिला होगा !!

अम्बरीश जी बधाई इस ग़ज़ल के लिए 

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 12, 2012 at 7:55am

बाढ़ जनता की मुसीबत है अफ़सरों  का मज़ा

उनके बिगड़े हुए हालात सुधर जाते है

बहुत सुन्दर शेर बधाई स्वीकार करें आदरणीय अम्बरीष जी.

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on October 12, 2012 at 12:57am

zam ke pehlu ke sath ghazal ke shuru hone ne nirash kiya ambresh ji 

Comment by वीनस केसरी on October 12, 2012 at 12:33am

जब भी हो जाये मुलाक़ात पसर जाते हैं

हुस्नवाले भी अजी हद से गुजर जाते हैं..........

हुस्न वालों का हद से गुज़र कर मुलाक़ात होते ही पसर जाना ???

हुजूर  जो अभिप्राय निकल रहा है उसे स्वीकार कर पाना कठिन है वह भी तब जब कोई अभी अभी नारी शक्ति पर आपके दोहे को पढ़ कर आ रहा हो
आपके इस शेर ने बहुत निराश किया है

देख हरियाली चले लोग सभी आते हैं

जो उगाता हूँ यहाँ रोज वो चर जाते हैं  .......  तकाबुले रदीफ  का ऐसा बड़ा दोष  !!!
 

प्यार  है जिनसे मिला उनसे शिकायत कैसी

देख तिरछी सी नज़र हम भी सिहर जाते हैं..... औसत

 

माल लूटें वो जबरदस्त जमा करने को

रिश्तेदारों के यहाँ शाम-ओ-सहर जाते हैं..... शेर और बेहतर हो सकता है

 

घर बनाने को चले जो भी नदी को पाटें   

बाढ़ में बह के वही लोग बिखर जाते हैं  

 

बाढ़ जनता की मुसीबत है अफ़सरों  का मज़ा

उनके बिगड़े हुए हालात सुधर जाते है.................. बढ़िया

 

प्यार से जब भी मिले प्यार जताया 'अम्बर'

क्यों ये कज़रारे नयन अश्क से भर जाते हैं

भाई जी  कोई  आपसे प्यार से मिले और बदले में आप भी प्यार जताएं तो इसमें अश्क की बात कहां से आ गई , बात तो तब है कि कोई आपसे बेरुखी से मिले और आप उसपर भी प्यार लुटाएं तो पशेमानी नयनों  अश्क से भर जाये

या आपने खुशी के आंसू की बात की है ? मामला तब भी नहीं जम रहा ...


आदरणीय अम्बरीश जी,
क्षमा प्रार्थी हूँ  परन्तु  इस सरल जमीन पर आपसे स्तरीय ग़ज़ल की अपेक्षा है और इस ग़ज़ल ने निराश किया है क्योकि आपने हमेशा अपनी ग़ज़लों से मुझे वाह वाह कहने को मजबूर किया है 
सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
yesterday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service