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गगनचुम्बी अट्टालिकाओं के
कटिंगदार झरोखों से लटक कर
धुंआयुक्त वातावरण में बीमार, खाँसते
अपने चेहरे की धूल को
कृत्रिम फुहारों से धोने की कोशिश में
बड़े दयनीय लगते हैं
छोटे से पात्र में कैद जड़ों के सहारे
संपूर्णता का भ्रम पाले और
मिट्टी की न्यूनता से कुपोषित
ठिगने से पौधों की
रसायनों से भरी डालियों पे
चुभती नुकीली पत्तियों के संग
भड़कीले चटख रंगों में सराबोर
तथाकथित खिले हुए
फूल शहरों के |

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on October 20, 2012 at 6:45pm

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय गुरुदेव सौरभ सर.......


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 16, 2012 at 10:36am

वाह-वाह !!

अतुक वातारण और बेचारग़ी का दंश जीती संज्ञाओं का वैचारिक मानवीयकरण रचना से किसी पाठक को एकसार कर देते हैं.

बधाई, अजीतेन्दु जी.

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on October 16, 2012 at 7:44am

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण सर......

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on October 16, 2012 at 7:44am

आपका हार्दिक आभार आदरणीया प्राची दीदी........

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 4, 2012 at 6:44pm
शह की धुआयुक्त वातावरण में पौधों की पीड़ा समझ अभिव्यक्त
 करने का अच्छा प्रयास | बधाई कुमार गौरव अजितेंदु जी  

 

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 4, 2012 at 6:00pm

शहरीकरण, औद्योगीकरण, बढ़ते प्रदूषण...से बेहाल डिब्बेनुमा घरौंदों की बालकनी से लटकते बेचारे चंद शुद्ध सांसों को तरसते,गमलों से झांकते नन्हे नन्हे पौधों के दर्द को बहुत संवेदनशीलता से महसूस करके कलमबद्ध करने के लिए हार्दिक बधाई  प्रिय कुमार गौरव जी. 

कृपया ध्यान दे...

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