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अमृत ही बरसाय
 (संशोधित दोहे)

 
खबरे पढ़ पढ़ जग मुआ, ज्ञानी भया न कोय,
छंदों में जब मन लगे,तब मन निर्मल होय //   
 
बालक को धन्धे लगा, अमीर बना न कोय 
बालक जो पढने लगे,  अकूत  सम्पदा होय // 
 
शीश नवा झुकजा सदा, कछु न बिगड़े जाय,
प्रेम भाव  जाग्रत हो,  श्रद्धा भाव भर जाय //
 
श्रद्धा भाव जाग्रत करे,  गुरु ज्ञान मिल जाय,
गुरुज्ञान जो मिल गया, सब कुछ ही मिलजाय //
 
छोटो का भी मान कर, मिल सकती है सीख,
वय का मोल न ज्ञान में, सरसवती की रीत //
 
छंद काव्य में गुण बड़े, पढ़े जो पंडित होय,
भाव से मन-भाव भरे, अमल करे गर कोय // 
 

गुरु ज्ञान बाँटन लगे, ले सके वही लेत,

भभूत समझे तो लगे, वर्ना वह तो रेत //
 
अमल करे तबही बढे, गुरु उसी के साथ, 
करम करे भाग्य बढे, भाग्य उसके साथ //   
 

जैसे सूखा कुसुम भी ,खुशबू  ही बिखराय   

साधू अपने ज्ञान से,  अमृत ही बरसाय //

 

 - लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर 

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 13, 2012 at 10:10am

भाई श्री अलबेला जी, आपकी सलाह को तो ओबीओ मेले में ही सिरोधार्य कर 

निश्चय कर लिया था की प्राचार्य अम्बरीश जी की निर्देशानुसार दोहे लिखने 
का सतत प्रयास करना है | आपकी यह सलाह भी आदेश रूप में लूँगा | धन्यवाद 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 13, 2012 at 9:50am

आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद लाडिवाला जी, आपकी छंद बद्ध विधाओं के प्रति सीखने की, व नित्य प्रयासरत रहने की भावनो को देख बहुत हर्ष होता है. बस ज़रा सा प्रयास और करिए आप निश्चय ही बहुत जल्द पूर्णतः शुद्ध दोहे लिख सकेंगे. हार्दिक शुभकामनाएं.

इन दोहों में निहित भावों हेतु हार्दिक बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 13, 2012 at 7:15am

आपकी प्रस्तुतियों से हमें भी उत्साह बना रहता है, आदरणीय लक्ष्मणजी.  पाठकों की जो अभी तक प्रतिक्रियाएँ आयी हैं, उनपर अविलम्ब ध्यान देते हुए आगे प्रयास किया जाय.

सादर

Comment by seema agrawal on September 13, 2012 at 12:33am

  आदरणीय  Laxman Prasad जी आप सिर्फ एक दिन किसी भी एक दोहे को पूरे दिन गुनगुनाइए ....... मात्राएँ गिन कर  छंद लिखा नहीं जा सकता सिर्फ जांच हो सकती है कि जो लिखा गया है वो नियमबद्ध है या नहीं  ...आपके कथ्य इतने अलग और समृद्ध होते हैं की उन्हें व्यर्थ जाते देख अच्छा नहीं लगता आप स्वयं  बिलकुल अनुशासित दोहा कह सकें ऐसी मेरी हार्दिक कामना है ....शुभकामनाएं 

महकता रहे पुष्प सदा, भले सूखता जाय,

साधू अपने ज्ञान से, है अमृत ही बरसाय /

 

जैसे सूखा कुसुम भी ,खुशबू  ही बिखराय   

साधू अपने ज्ञान से,  अमृत ही बरसाय.

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2012 at 11:01pm

बहुत खूब ...आदरणीय लक्ष्मण जी,  सुन्दर भावयुक्त दोहों के लिए बधाई स्वीकारें मित्रवर !   आदरणीय अलबेला जी ने सत्य कहा है ....उस पर ज़रा ध्यान दें !

Comment by Albela Khatri on September 12, 2012 at 10:14pm

आदरणीय लड़ी वाला जी........आपके दोहे बांच कर प्रसन्नता हुई.........बस थोड़ा सा और परिश्रम  करें तो आप कुशल दोहाकार बन सकते हैं.........बस इत्ता भर करना है कि प्रकाशित करने के पहले दो तीन बार खुद  बांच लें.......आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे मेरे कथन को.........

खबर पढ़ कर जग मुआ, ज्ञानी हुआ न कोय,_____ख़बरें पढ़ पढ़ जग मुआ, ज्ञानी भया न कोय 

छंद काव्य में मन लगा, मन निर्मल सा होय //____छंदों में जब मन लगे, तब मन निर्मल होय

__सादर

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