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इन्साफ जो मिल जाय तो दावत की बात कर  

मुंसिफ के सामने न रियायत की बात कर

 

तूने किया है जो भी हमें कुछ गिला नहीं

ऐ यार अब तो दिल से मुहब्बत की बात कर

 

गर खैर चाहता है तो बच्चों को भी पढ़ा

आलिम के सामने न जहालत की बात कर

 

अपने ही छोड़ देते तो गैरों से क्या गिला

सब हैं यहाँ ज़हीन सलामत की बात कर

 

'अम्बर' भी आज प्यार की धरती पे आ बसा 

जुल्मो सितम को भूल के जन्नत की बात कर

--अम्बरीष श्रीवास्तव  

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Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 13, 2012 at 11:49am

प्रिय कुमार गौरव अजीतेंदु जी, इस ग़ज़ल को पसंद करने के लिए बहुत-बहुत आभार !

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 13, 2012 at 11:12am

Comment by Albela Khatri on September 13, 2012 at 11:01am

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 13, 2012 at 10:55am

स्वागत है प्रिय भाई संदीप जी, इस गज़ल की तारीफ में दी गयी प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया दोस्त !

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 13, 2012 at 10:54am

स्वागत है आदरणीय अलबेला जी, आप की तारीफ़ पाकर इस ग़ज़ल का कहना सफल हो गया ! बहुत बहुत दिली शुक्रिया भाईजी !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 13, 2012 at 10:39am

वाह वाह वाह आदरणीय अम्बरीश सर जी क्या कहने हैं
लाजवाब ग़ज़ल कही है आपने
इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए दिली दाद क़ुबूल कीजिये

Comment by Albela Khatri on September 13, 2012 at 9:19am

साधु साधु
क्या कहने..........
अनुपम ग़ज़ल कही आपने अम्बरीश जी.........

इन्साफ जो मिल जाय तो दावत की बात कर  

मुंसिफ के सामने न रियायत की बात कर

 

तूने किया है जो भी हमें कुछ गिला नहीं

ऐ यार अब तो दिल से मुहब्बत की बात कर

 

गर खैर चाहता है तो बच्चों को भी पढ़ा

आलिम के सामने न जहालत की बात कर

 

अपने ही छोड़ देते तो गैरों से क्या गिला

सब हैं यहाँ ज़हीन सलामत की बात कर

 

'अम्बर' भी आज प्यार की धरती पे आ बसा 

जुल्मो सितम को भूल के जन्नत की बात कर

__लफ्ज़ लफ्ज़ मोती  की तरह चमक रहा है ....इस ग़ज़ल में इन्सानी जज़्बा दमक रहा है ..........मुबारक हो जी.........

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2012 at 8:52pm

सुस्वागतम आदरेया सीमाजी, 

इस ग़ज़ल को दिल से सराहने के लिए तहे दिल से आपका शुक्रिया ! आज के परिवेश का सच व्यंग्य के माध्यम से ही तो कहा जा सकता है अतः इस मतले का सहारा लेना ही पड़ा ....और शेष रही मक्ते की बात तो धरती के हृदय में हम सभी के प्रति इतना प्यार व स्नेह है.....जिसकी कोई थाह ही नहीं ......सादर 

Comment by seema agrawal on September 12, 2012 at 8:35pm

इन्साफ जो मिल जाय तो दावत की बात कर  

मुंसिफ के सामने न रियायत की बात कर

अम्बर' भी आज प्यार की धरती पे आ बसा 

जुल्मो सितम को भूल के जन्नत की बात कर.....वाह बहुत खूबसूरत गज़ल सभी शेर बहुत बढ़िया हैं पर इन दोनों में जो बात है उसके .............................................................कहने ही क्या

................मुबारकबाद ..............

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2012 at 8:23pm

प्रिय कुमार गौरव जी,

इस ग़ज़ल की तारीफ़ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया अनुज ! सस्नेह 

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