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राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३०

(आज से दस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

जी चाहता है...

 

आज गमों में डूबा-डूबा है

मेरे एहसास का हर गोशा

भीगी-भीगी हैं पलकों पे

थके -थके  तसव्वुर की बूँदें

रुका-रुका सा है जाता हुआ

इमरोज़ का साया

बुझे-बुझे से हैं बर्ग दरख्तों पे

और धूप के साये दीवारों पे

हर तरफ गुमशुदगी है नुमायाँ

और उदासी है निगाहों में

जी चाहता है आज कहीं न जाऊँ

कुछ न करूँ,

देर तलक बैठा रहूँ

चुपचाप...

अपने माज़ी के  बियावानों में.

 

© राज़ नवादवी

ग्रामीण डेवेलपमेंट सर्विसेस, अलीगंज, लखनऊ

(२२/०३/२००२)

Views: 281

Comment

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Comment by राज़ नवादवी on July 3, 2012 at 9:57pm

प्रिय सौरभ जी, धन्यवाद, सच कहा आपने- बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी- महेंद्र कपूर के गाये हुए इक गाने की पंक्ति भी यही बयान करती है. अतीत कल्पना में बिम्बित सच का एक झूठा चित्र ही तो है. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 1, 2012 at 2:57pm

अत्यंत ही सधे हुए अंदाज़ में नेपथ्य में जीते जाने को अर्थवान करती चली गयी हैं पंक्तियाँ.. .

काश,  ज़िन्दग़ी के गुजर गये कुछ पल हम फिर-फिर जी पाते. बीत गये अपने-अपने से कुछ समय वापस आ पाते, ठहर-से जाते.. और हम फिर से उन्हें छू कर महसूस कर पाते.

बेहतर कहा है आपने. मुबारकबाद कह रहा हूँ.

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