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जब जब बेटी के ससुराल से फोन आता तो भार्गव जी अन्दर तक काँप उठते. दरअसल शादी के एकदम बाद दामाद ने नई कार देने की मांग रख दी थी. उसी वजह से कई बार बिटिया मायके आ भी चुकी थी. मामूली सी पेंशन पाने वाले भार्गव जी हर बार बिटिया को समझा बुझा कर वापिस भेज देते. लेकिन इस बार ससुराल का इतना दबाव था कि बिटिया समझाने पर भी नहीं मान रही थी और ज़िद पकड़ कर बैठ गई थी. भार्गव जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें.

आखिर एक दिन
अचानक दामाद के लिए नई कार आ ही गई, और बेटी अगले रोज़ अपने पति के साथ नई गाड़ी में ख़ुशी ख़ुशी विदा हो गई. भार्गव जी के मन से एक भारी बोझ उतरा, लेकिन उनकी पत्नी ऐसी अनुचित मांग को पूरा करने पर बेहद नाराज़ थी.

"आज तो आपने इनकी मांग पूरी कर दी, लेकिन कल इन्होने कोई और महंगी चीज़ मांग ली तब आप क्या करोगे ?"
"चिंता काहे करती हो भगवान्, अभी तो एक और किडनी मौजूद है मेरे शरीर में."

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 23, 2012 at 12:36pm
 आदरणीय भाई योग राज जी, बहुत थोड़े से शब्दों में लघु कथा के 
माध्यम से "गागर में सागर" जैसा लिख डाला | समाज में बेटी के
हाथ पीले करने और उसे खुश रखने के लिए "मरता क्या न करता"
की कहावत को इस कहानी के माध्यम से कह डाला | बहुत बधाई 
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला, जयपुर 
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 23, 2012 at 10:43am

पिता पिता होता है
बच्चों के लिए तन मन धन सब अर्पण कर देता है
ऐसे दामाद मिलना दुर्भाग्य है उस पिता का
और उस बेटी का भी
जिसे प्यार पाने के लिए कार ले के ससुराल   जाना पड़े
अच्छा  लिखा  सर  जी
ये भी एक कटु सत्य है इस पावन भारत भूमि का 
साधुवाद  सहित नमन आपको

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