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थम गया है वक़्त ..
जम गए हैं कदम ..
पसरा है सनसनाता सन्नाटा ..
अपना घर आँगन 
जो महकता था 
फूलों की बगिया सा,
गुलमोहर के पेड़ से 
झड़ते थे जहाँ आशीषों के फूल ..
अब है वीरान  खंडहर सा..
नहीं लौट रहे
स्नानकर, वापिस
अपने वीराने आशियाने की ओर
भारी कदम..
आँखों की बदरी में
पिघल रहे हैं गुज़रे लम्हें ,
जो दुआओं से रौशन थे
अब अन्धकार में डूबे हैं..
डबडबाई आँखें  
और भीगा मन
नहीं है इंतज़ार,
सिर्फ पसरा है
सूनापन..
उड़ गए हैं धुंआ बन 
उनकी रूह और जिस्म के साथ
हमारे अनगिन ख्वाब..
खोखला हो गया
अस्तित्व जैसे,
ज्वालामुखी फटे से
सूना हो जाए
गिरि का सीना
हमेशा के लिए...
 
 

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Comment

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Comment by Dr.Prachi Singh on June 5, 2012 at 11:29am

सुश्री रेखा जी,

इस काव्य में निहित भावों को सराहने हेतु आपका हार्दिक आभार.
Comment by Rekha Joshi on June 5, 2012 at 10:57am

Dr Prachi ji,डबडबाई आँखें  

और भीगा मन
नहीं है इंतज़ार,
यूँ पसरा है सूनापन..
उड़ गए हैं धुंआ बन 
आपकी रूह और जिस्म के साथ,bahut sundr bhaav
Comment by Albela Khatri on June 5, 2012 at 9:55am

भई चश्मा होने के बावजूद मैं देख नहीं पाया..........क्षमा  चाहता हूँ........मेरा बेटा सही कहता है ," पापा, तुम बुड्ढे हो गये हो" हा हा हा


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 5, 2012 at 9:53am

प्रिय महिमा जी, इस सन्नाटे को कविता के साथ साथ महसूस करने के लिए ह्रदय से आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 5, 2012 at 9:50am
हार्दिक आभार आदरणीय अलबेला खत्री जी...
सादर, शायद आपको कोई गलतफहमी हो गयी है.
आपकी हर टिप्पणी सर-आँखों पर, सर.
आपकी टिप्पणी यथास्थान ही है.
Comment by Albela Khatri on June 5, 2012 at 9:37am


डॉ प्राची सिंह जी, बहुत बहुत उम्दा कविता के लिए आपका ढेरों अभिनन्दन.
लेकिन इस कविता पर तो मैंने  रात को ही टिप्पणी कर दी थी............तो वो गई कहाँ  ?
क्या वो इतनी बुरी थी कि आपने  डिलीट कर दी ...हा हा हा . कोई बात नहीं...चलता है........जय हिन्द

Comment by Albela Khatri on June 4, 2012 at 10:25pm

डॉ प्राची सिंह जी आपको ख़ूब ख़ूब  बधाई इस  मार्मिक काव्य के लिए
हार्दिक अभिनन्दन
गिरी का सीना_____गिरि

Comment by MAHIMA SHREE on June 4, 2012 at 9:33pm
आँखों की बदरी में
पिघल रहे हैं गुज़रे लम्हें ,
जो दुआओं से रौशन थे
अब अन्धकार में डूबे हैं..
डबडबाई आँखें  
और भीगा मन
नहीं है इंतज़ार,

आदरणीया प्राची जी .. आपकी भावनाओ को नमन .. सत्य को स्वीकारती और अतीत को याद करती अभिव्यक्ति . सन्नाटा एक क्षण को यंहा भी पसर गया / बधाई


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Comment by Dr.Prachi Singh on June 4, 2012 at 7:40pm
हार्दिक आभार आदरणीय अविनाश बागडे जी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 4, 2012 at 7:36pm
हार्दिक आभार चन्दन राय जी

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