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मेरा अंतर्विरोध

मेरा अंतर्विरोध ,
लिबलिबी उत्तेजित ट्रिगर दबी पिस्तौल है !
जब भी जमने लगता है प्रशस्तर ,
अहसासात की रूमानियत और इंसानियत पर,
तत्क्षण वँही ठोक देता है धांय-धांय,
ढेर कर देता है सारा व्रफुरपन मेरा अंतर्विरोध !

बदन के कुएं में जब भरने लगता है झूठ
सारी काली कमाई गंदे खून की चूस लेता है मेरा अंतर्विरोध !
भर देता है जाकर कान आईने के मेरा अंतर्विरोध ,
फिर घुसकर आईने में तडातड झापट रसीद करता है चेहरे पर ,
जैसे मल्लयुद्ध कोई,यूँ धोबी पछाड़ लगा पटक देता है मेरा अंतर्विरोध !
रात भर तब जगाए रखता है पीने को नींद नहीं देता ,
मेरे ठीक होने तक मलाल के इंजेक्शन घोंपता है मेरा अंतर्विरोध !

जब भी जमने लगती है कालिख-गलीज खोपड़ी में
सदाचार के तेज़ाब से घिस-रगड़ साफ़ करता है भेजा मेरा अंतर्विरोध !
भोंक सुआ, गरम चिमटा नासूर हो रहे बद्ख्याल पर
सारा मवाद दुर्जनता का बहा मलहम लगाता है मेरा अंतर्विरोध !
जब तलक नहीं होता क्रोध-मोह-दंभ-ईर्ष्या-द्वेश विच्छेद
मुझे शल्य सा कोंचता रहता है आत्मा का सारथी मेरा अंतर्विरोध !

मेरा अंतर्विरोध मुझे प्रयास से नपुंसक नहीं होने देता,
नहीं करने देता किस्मत को मेरे हौसलों की नसबंदी !
जब दबा होता हूँ टनों मीट्रिक हार के ढेर के नीचे,
तब भी बदन में नया फौलाद भर रहा होता है मेरा अंतर्विरोध !
हाँ मेरा दुश्मन भी है और मेरा दोस्त भी मेरा अंतर्विरोध !

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Comment

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Comment by chandan rai on June 4, 2012 at 4:42pm
राजेश कुमारी जी
आपने रचना के मर्म को भली भाँती समझा , और उसकी आवश्यकता को चिन्हित किया
आपके सुन्दर वचनों के लिए
आपका तहे दिल से शुक्रिया !
Comment by chandan rai on June 4, 2012 at 4:39pm
योगी मित्रवर
आप को बोला था न मित्र , आप पहुचे हुए हो
सचमुच आप बहुत ही सज्जन व्यक्ति हो
आपका तहे दिल से शुक्रिया !
Comment by chandan rai on June 4, 2012 at 4:37pm
योगराज जी ,
आप जैसे अग्रज जब सम्मान देते है हमेशा ही होसला बढ़ता है ,
कुछ बेहतरीन करने का जज्बा आता है
आपका तहे दिल से शुक्रिया !
Comment by chandan rai on June 4, 2012 at 4:36pm
कुशवाहा जी ,
आप हमेशा ही होसला बढ़ाते रहे है , आपका तहे दिल से शुक्रिया !

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 4, 2012 at 4:34pm

अति सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई स्वीकार करें चन्दन राय जी

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 4, 2012 at 4:11pm

मेरा अंतर्विरोध मुझे प्रयास से नपुंसक नहीं होने देता,
नहीं करने देता किस्मत को मेरे हौसलों की नसबंदी !
जब दबा होता हूँ टनों मीट्रिक हार के ढेर के नीचे,
तब भी बदन में नया फौलाद भर रहा होता है मेरा अंतर्विरोध !
हाँ मेरा दुश्मन भी है और मेरा दोस्त भी मेरा अंतर्विरोध !

आपके दोस्त और दुश्मन को मेरा सलाम 

Comment by Yogi Saraswat on June 4, 2012 at 3:57pm

अपने अंतर्विरोध और उससे लड़ने , उसे चुनौती देने की हिम्मत जब आ जाती है तब आदमी , इंसान हो जाता है ! बेहतरीन प्रस्तुति , श्री चन्दन राय जी !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 4, 2012 at 12:46pm

ऐसा जानदार अंतर्विरोध होना चाहिए इस अंतर्विरोध को भगवान् बल दे ये ताकत हमारे नेताओं में क्यूँ नहीं कहाँ गया उनका अंतर्विरोध???? ...बहरहाल बधाई कबूल कीजिये इस दमदार रचना के लिए 

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