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तुम चले क्यों गये ?

तुम चले क्यों गये
मुझको रस्ता दिखा के, मेरी मन्ज़िल बता के
तुम चले क्यों गये

तुमने जीने का अन्दाज़ मुझको दिया
ज़िन्दगी का नया साज़ मुझको दिया
मैं तो मायूस ही हो गया था, मगर
इक भरोसा-ए-परवाज़ मुझको दिया.
फिर कहो तो भला
मेरी क्या थी ख़ता
मेरे दिल में समा के, मुझे अपना बना के
तुम चले क्यों गये

साथ तुम थे तो इक हौसला था जवाँ
जोश रग-रग में लेता था अंगड़ाइयाँ
मन उमंगों से लबरेज़ था उन दिनों
मिट चुका था मेरे ग़म का नामो-निशाँ.
फिर ये कैसा सितम
क्यों हुए बेरहम
दर्द दिल में उठा के, मुझे ऐसे रुला के
तुम चले क्यों गये
तुम चले क्यों गये
तुम चले क्यों गये?


शब्दार्थ:
परवाज़ = उड़ान
रग-रग = नस-नस
लबरेज़ = भरा हुआ

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Comment by moin shamsi on September 28, 2010 at 3:55pm
thanx a lot to all of you.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 28, 2010 at 3:50pm
मैं तो मायूस ही हो गया था, मगर
इक भरोसा-ए-परवाज़ मुझको दिया.
फिर कहो तो भला
मेरी क्या थी ख़ता
मेरे दिल में समा के, मुझे अपना बना के
तुम चले क्यों गये ??
वाह वाह क्या कहूँ इस रचना पर सिर्फ यही कहूँगा कि "आप तो कमाल कर गये मियाँ" बहुत खूब, बधाई कुबूल करे जनाब |
Comment by आशीष यादव on September 28, 2010 at 5:52am
Wah moin sir, kamal ka git likha hai.
Comment by Hilal Badayuni on September 27, 2010 at 8:52pm
bahut khoob moin miyan achche khyaalat ki bandish ki hai

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