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Moin shamsi's Blog (13)

धारावाहिक यात्रा-संस्मरण "चार-गाम-यात्रा" (All rights are reserved.)

हज़रत निज़ामुद्दीन-बैंगलोर राजधानी ऐक्स्प्रेस में दो रातों तक कुछ नन्हे-मुन्ने कॉकरोचों से दो-दो हाथ करते हुए 30 अक्टूबर की सुबह जब हम बैंगलोर सिटी जंक्शन पहुंचे तो दिन निकल चुका था । ट्रेन रुकने से पहले ही हमें उन क़ुलियों ने घेर लिया जो चलती ट्रेन में ही अन्दर आ गये थे । सामान उठाकर ले चलने से लेकर होटल दिलाने, लोकल साइट-सीइंग और मैसूर-ऊटी तक का टूर कराने के ऑफ़र्ज़ की बरसात होने लगी । मगर हम तो काफ़ी जानकारी पहले से ही इकट्ठा करके पूरी तैयारी से आये थे, इसलिये क़ुली साहिबान की दाल नहीं…

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Added by moin shamsi on July 26, 2011 at 1:34pm — 15 Comments

"व्यथा" मेरी, आवाज़ भी मेरी !

दोस्तो ! अपनी एक पुरानी रचना "व्यथा" सुना रहा हूं । बर्दाश्त कीजियेगा ।…

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Added by moin shamsi on June 9, 2011 at 2:00pm — No Comments

मेरा कलाम मेरी आवाज़ में

ओबीओ पर आप दोस्तों ने मेरा कलाम पढ़कर हमेशा मेरी हौसला-अफ़्ज़ाई की है । आप क़द्रदानों के लिये मैं अपनी ताज़ा ग़ज़ल को, जोकि "OBO लाइव तरही मुशायरा" अंक ११ में शामिल हुई थी, अपनी ख़ुद की आवाज़ में पेश कर रहा हूं । इसे सुनने के लिये नीचे दिये बॉक्स के प्ले बटन को क्लिक करें :…

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Added by moin shamsi on June 1, 2011 at 2:30pm — 14 Comments

’मदर्स-डे’ स्पेशल (मां का प्यार)

सबसे पावन, सबसे निर्मल, सबसे सच्चा मां का प्यार

सबसे अनोखा, सबसे न्यारा, सबसे प्यारा मां का प्यार ।



बच्चे को ख़ुश देख-देख के, मन ही मन हंसता रहता

जब संतान पे विपदा आए, तड़प ही उठता मां का प्यार ।



सुख की ठंडी छांव में शीतल पवन के जैसा लहराता…

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Added by moin shamsi on May 7, 2011 at 5:00pm — 8 Comments

होली-ग़ज़ल

प्रेम के रंग में सब रंग जाएं, दिन है ठेल-ठिठोली का

मिटें नफ़रतें बढ़े मुहब्बत, तभी मज़ा है होली का ।



एक न इक दिन भर जाते हैं, घाव बदन पर जो लगते

ज़ख़्म नहीं भरता है लेकिन, कभी भी कड़वी बोली का ।



ज़ात-धरम-सिन-जिंस न देखे, बदन में जा कर धंस जाए

कोई अपना सगा नहीं होता, बंदूक़ की गोली का ।



कभी महल में रहता था वो, क़िस्मत ने करवट बदली

नहीं किराया दे पाता है, अब छोटी-सी खोली का ।



दूर से तुम अहवाल पूछ कर, रस्म अदा क्यों करते हो

पास… Continue

Added by moin shamsi on March 19, 2011 at 9:24pm — No Comments

होली की कविता

रंग-बिरंगी प्यारी-प्यारी,
होली की भर लो पिचकारी ।

इक-दूजे को रंग दो ऐसे,
मिटें दूरियां दिल की सारी ।

तन भी रंग लो मन भी रंग लो,
परंपरा यह कितनी न्यारी ।

रंगों का त्योहार अनोखा,
आज है पुलकित हर नर-नारी ।

प्रेम-पर्व है आज बुझा दो,
नफ़रत की हर-इक चिंगारी ।

जाति-धर्म का भेद भुला दो,
मानवता के बनो पुजारी ।

मेलजोल में शक्ति बहुत है
वैर-भाव तो है बीमारी ।

Added by moin shamsi on March 19, 2011 at 9:23pm — No Comments

इस बार...

(मेरी ये रचना बिल्कुल नवीन, अप्रकाशित और अप्रसारित है।)





इस बार दशहरे पे नया काम हम करें,

रावण को अपने मन के चलो राम हम करें ।



दूजे के घर में फेंक के पत्थर, लगा के आग,

मज़हब को अपने-अपने न बदनाम हम करें ।



उसका धरम अलग सही, इन्सान वो भी है,

तकलीफ़ में है वो तो क्यूं आराम हम करें ।



माज़ी की तल्ख़ याद को दिल से निकाल कर,

मिलजुल के सब रहें, ये इन्तिज़ाम हम करें ।



अपने किसी अमल से किसी का न दिल दुखे,

जज़बात का सभी… Continue

Added by moin shamsi on October 12, 2010 at 5:25pm — 8 Comments

एक प्रतिभागी की व्यथा-कथा

मैं तो बस एक प्रतिभागी हूं.



वक्ता के समर्थन में



सिर हिलाना ही



मेरी नियति है.



संवाद बोलने को तरसता,



एक्सप्रेशन्स दर्शाने को लालायित,



मूव्मेंट्स करने को निषिद्ध,



किंकर्तव्यविमूढ़ सा,



अश्व की भाँति



सिर हिलाता,



मन ही मन



परमात्मा से विनती करता रहता हूं,



कि हे ईश्वर,



ये वक्तागण ख़ूब ग़लतियाँ करें.



ताकि मुझ 'एक्सट्रा कलाकार' की,



एक दिन की… Continue

Added by moin shamsi on October 10, 2010 at 12:56pm — No Comments

क्यूं है !

सबके होते हुए वीरान मेरा घर क्यूं है,

इक ख़मोशी भरी गुफ़्तार यहां पर क्यूं है !



एक से एक है बढ़कर यहां फ़ातेह मौजूद,

तू समझता भला ख़ुद ही को सिकन्दर क्यूं है !



वो तेरे दिल में भी रहता है मेरे दिल में भी,

फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मन्दर क्यूं है !



सब के होटों पे मुहब्बत के तराने हैं रवाँ,

पर नज़र आ रहा हर हाथ में ख़न्जर क्यूं है !



क्यूं हर इक चेहरे पे है कर्ब की ख़ामोश लकीर,

आंसुओं का यहां आंखों में समन्दर क्यूं है !



तू… Continue

Added by moin shamsi on October 6, 2010 at 5:44pm — 3 Comments

ग़मों की धूप

ग़मों की धूप से तू उम्र भर रहे महफ़ूज़,
ख़ुशी की छाँव हमेशा तुझे नसीब रहे ।
रहे जहाँ भी तू ऐ दोस्त ये दुआ है मेरी,
मसर्रतों का ख़ज़ाना तेरे क़रीब रहे।
तू कामयाब हो हर इम्तिहाँ में जीवन के,
तेरे कमाल का क़ायल तेरा रक़ीब रहे ।
तू राह-ए-हक़ पे हो ता-उम्र इब्न-ए-मरियम सा,
बला से तेरी कोई मुन्तज़र सलीब रहे ।
नहीं हो एक भी दुश्मन तेरा ज़माने में,
मिले जो तुझसे वो बन के तेरा हबीब रहे ।
न होगा ग़म मुझे मरने का फिर कोई ’शम्सी’,
जो मेरे सामने तुझ-सा कोई तबीब रहे ।

Added by moin shamsi on September 29, 2010 at 5:54pm — 1 Comment

बाल कविता

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई,
आपस में सब भाई-भाई ।

बहकावे में आ जाते हैं,
हम में है बस यही बुराई ।

अब नहीं बहकेंगे हम भईया,
हम ने है ये क़सम उठाई ।

मिलजुल कर हम सदा रहेंगे,
हमें नहीं करनी है लड़ाई ।

देश करेगा ख़ूब तरक़्क़ी,
हर घर से आवाज़ ये आई ।

Added by moin shamsi on September 28, 2010 at 3:30pm — 1 Comment

तुम चले क्यों गये ?

तुम चले क्यों गये

मुझको रस्ता दिखा के, मेरी मन्ज़िल बता के

तुम चले क्यों गये



तुमने जीने का अन्दाज़ मुझको दिया

ज़िन्दगी का नया साज़ मुझको दिया

मैं तो मायूस ही हो गया था, मगर

इक भरोसा-ए-परवाज़ मुझको दिया.

फिर कहो तो भला

मेरी क्या थी ख़ता

मेरे दिल में समा के, मुझे अपना बना के

तुम चले क्यों गये



साथ तुम थे तो इक हौसला था जवाँ

जोश रग-रग में लेता था अंगड़ाइयाँ

मन उमंगों से लबरेज़ था उन दिनों

मिट चुका था मेरे ग़म का… Continue

Added by moin shamsi on September 27, 2010 at 5:56pm — 4 Comments

वर्ल्ड हार्ट डे ('World Heart Day 26.09.2010) पर

कोई भी बात दिल से न अपने लगाइये,

अब तो ख़ुद अपने दिल से भी कुछ दिल लगाइये ।



दिल के मुआमले न कभी दिल पे लीजिये,

दिल टूट भी गया है तो फिर दिल लगाइये ।



दिल जल रहा हो गर तो जलन दूर कीजिये,

दिलबर नया तलाशिये और दिल लगाइये ।



तस्कीन-ए-दिल की चाह में मिलता है दर्द-ए-दिल,

दिलफेंक दिलरुबा से नहीं दिल लगाइये ।



दिल हारने की बात तो दिल को दुखाएगी,

दिल जीतने की सोच के ही दिल लगाइये ।



बे-दिल, न मुर्दा-दिल, न ही संगदिल, न… Continue

Added by moin shamsi on September 26, 2010 at 5:30pm — 3 Comments

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