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गज़ल - जिन्हें डर है खुदा का

उन्हें हक है कि मुझको आजमाएं

मगर  पहले  मुझे अपना बनाएं

 

खुदा  पर है यकीं तनकर चलूँगा

जिन्हें डर है खुदा का सर झुकाएं

 

जुदा होना है कल तो मुस्कुराकर

चलो   बैठे   कहीं  आँसू   बहाएं

 

तुम्हारे  आफताबों  की वज़ह से

अभी  कुछ  सर्द  है  बाहर हवाएं

 

तिरा  दरबार  है मुंसिफ भी  तेरे

कहूँ  किससे  यहाँ  तेरी  खताएं

 

खता उल्फत की करने जा रहा हूँ

कहो  अय्याम  से  पत्थर उठाएं

 

अंधेरे   सूर्य  से  डरते   नही   है

चलो हम दीप बनके  जगमगाएं

 

............................... अरुन श्री !

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Comment

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Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 4, 2012 at 8:49am

आदरणीय अरुण भाई..ऐसा अनेक बार हुआ है,जब अनेक का अनेकों हो गया है|स्वयं मैथिलीशरण गुप्त ने भारत भारती में कई बार ऐसा किया है|अपने सौर मण्डल के सापेक्ष एक आफताब वाली बात वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्य समप्रभ के सम्मुख मिथ्या हो जाती है|मैं कोई वरिष्ठ नहीं हूँ मित्र और कोई आलोचक भी नहीं|मुझे आपकी रचना बहुत ही पसंद आई|फिलहाल आपके द्वारा दिए गए उदाहरणों को हृदयंगम कर लिया है और आपकी अपना पक्ष रखने की इस कला ने भी मुझे आपका मुरीद बना दिया है|सादर वंदे

Comment by Arun Sri on April 3, 2012 at 8:55pm

संदीप जी ! आपने गज़ल को अपना समय दिया ! आभारी हूँ !

Comment by Arun Sri on April 3, 2012 at 8:54pm

प्रदीप सर ! आपकी प्रतिक्रिया ने गज़ल का सम्मान बढ़ाया ! आभारी हूँ !

Comment by Arun Sri on April 3, 2012 at 8:52pm

साही सर ! धन्यवाद सराहना के लिए !

Comment by Arun Sri on April 3, 2012 at 8:50pm

मनोज मयंक सर , मुझे भी यही पता है कि आफताब सूरज को कहतें हैं !

तुम्हारे आफताबों की वज़ह से

अभी कुछ सर्द है बाहर हवाएं..............ये एक प्रतीकात्मक बात है ! मैंने कहने का प्रयास किया है कि सक्षम लोग भी गलत लोगों की  दासता स्वीकार कर अपनी क्षमता खो  देते है ! बाकी आप वारिष्ट है ! आप जो कहेंगे निश्चित ही सही होगा !

और रही इसे बहुवचन की तरह प्रयोग करने की बात तो ऐसे कई उदहारण है जहाँ इस शब्द का प्रयोग किया गया है ! जैसे

यहाँ जुगनुओं की हुकूमत हुई है
यहाँ आफताबों का रुतबा नही है
या फिर फ़िराक गोरखपुरी की किताब गुले नगमा से एक गज़ल का शे'र
दौरे-अफलाक का शबाब है तू
आफताबों का आफ़ताब है तू

या फिर "बज्में जिंदगी - रंगे शायरी " नामक  किताब से -
इनका शजरा आफताबों से भी ऊँचा है बहुत
आपसे मिलीए जनाबे इश्क आली खांन्दा

बाकी गज़ल पर आपकी सराहना के लिए धन्यवाद !

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 3, 2012 at 2:12pm

ख़ूबसूरत शब्द, ख़ूबसूरत भाव, ख़ूबसूरत ग़ज़ल| इससे अधिक कह पाना मेरे वश का नहीं अरुण जी| बहुत सुन्दर| बधाईयां!

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 3, 2012 at 2:02pm

बहुत खूब ...वाह वाह अरुण भाई ....गजल अच्छी बनी है और अंदाजेबयां भी माशाल्लाह...सिर्फ एक शेर समझ में नहीं आया ....

तुम्हारे आफताबों की वज़ह से

अभी कुछ सर्द है बाहर हवाएं|मुझे जहाँ तक पता है आफताब सूरज को कहते हैं और इसे बहुवचन की तरह प्रयुक्त नहीं किया जा सकता|फिर भी विरोधाभास का एक बेहतरीन उदाहरण|आभार|

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 3, 2012 at 2:02pm

kish ansh ko sabse behtar chunu, asmanjas main hoon. snehi arun ji sadar badhai

Comment by Arun Sri on April 3, 2012 at 12:10pm

मंजू मैम ! सराहना हेतु धन्यवाद !

Comment by minu jha on April 3, 2012 at 11:44am

खता उल्फत की करने जा रहा हूँ

कहो  अय्याम  से  पत्थर उठाएं

बहुत खुब अरूण जी

कृपया ध्यान दे...

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