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बस! 
-----

कभी 

प्यादों सी
बेबसी को
जीता!
कभी
ढाई -घर 
उछलती 
अश्व -शक्ति के
जोश में
उफनता!
कभी 
ऊँट की
आडी -तिरछी
तिरपट-चालों का
नशा ढोता !
कभी
कोने में बैठे
हाथी की
कुंद होती
बुद्धिमत्ता का
अहसास झेलता!
कभी
मंत्री की
निरंकुशता के बीच
अकर्मण्य- राजा को
बात-बेबात
'शह' बोलकर
मात देने का
रंज!!!!
बस!
इन्ही
काले-सफ़ेद
घरों में
सिमट के
रह गया है
मेरे
जीवन का
शतरंज!!!!!!!
-----
अविनाश बागडे...

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 16, 2012 at 8:22pm
सचमुच बागड़े जी जीवन एक शतरंज की बिसात ही है,जहां हरेक मुहरा अपने प्रतिद्वन्दी को समेट देने पर आमादा है,हर मुहरा अपनी चाल चलता है।
एक बात और साहब अपनी बात बताउंगा-हालांकि शतरंज मेरा प्रिय खेल है और मैं समय मिलने पर जमके खेलता हूं घंटों,पर यह आइडिया मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया आपके सोचने की क्षमता पर मुझे ईर्ष्या हो रही है।
फिल्हाल एक लम्बा सा दाद कुबूल कीजिए अपने सोचने की क्षमता के नाम पर क्योंकि शतरंज को जीवन से जोड़ने की बाजी आपने जीत।और बधाई स्वीकार कीजिए रचना पर।
Comment by AVINASH S BAGDE on March 16, 2012 at 7:31pm
.बहुत-बहुत धन्यवाद...संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी ji' ...PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA ji...MAHIMA SHREE mam.
Comment by MAHIMA SHREE on March 16, 2012 at 3:09pm
अविनाश जी
नमस्कार ..आपने बड़ी खूबसूरती से शतरंज
की चालो को बिम्ब बनाकर जीवन की विसंगतियों का तुलनात्मक प्रस्तुति दी है....बहुत -२ बधाई..
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 16, 2012 at 2:26pm

jindgi hi shatranj hai. badhai mahoday ji saadar. 

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 16, 2012 at 12:06pm

शतरंज को प्रतीक माध्यम बना कर जीवन के घटनाक्रम का जीवंत चित्रण किया आपने| बहुत ही अलग़ लगी यह कविता| हार्दिक बधाई|

Comment by AVINASH S BAGDE on March 16, 2012 at 10:58am

 Dr. Prachi Singh ...Thanks a lot for your valuable impression.

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