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मेरे ही पुत्रों ने,
मुझे,
लूटा है बार-बार!
एक बार नहीं,
हजार बार!
अपनी अंत: पीड़ा से
मैं रोई हूँ, जार जार!
हे, मेरे ईश्वर,
हे मेरे परमात्मा,
दे इन्हें सदबुद्धि,
दे इन्हें आत्मा,
न लड़ें, ये खुद से,
कभी धर्म या भाषा के नाम पर,
कभी क्षेत्रवाद,

जन अभिलाषा के नाम पर.
ये सब हैं तो मैं हूँ,
समृद्ध, शस्य-श्यामला.
रत्नगर्भा, मही मैं,
सरित संग चंचला.
मत उगलो हे पुत्रों,
अनल के अंगारे,
जल जायेंगे,
मनुज,संत सारे.
——————————
हे महादेव, हे नीलग्रीवा,
धरो रूद्र रूप, करो संतसेवा.
करो भस्म तम को, नृत्य तांडव करो तुम,
घट विष का हे शिव, करो अब शमन तुम.
—————————————
हे मेरे राम, कब आओगे काम!
हे मेरे आका बचा लो ‘निज’ धाम.
सिया अब पुकारे, हरण से बचा ले,
ये रावणों की सेना, लेते हैं तेरा नाम.
जरूरत नहीं है, अब लंका दहन की,
अवधपुर जले हैं, जरूरत शमन की.
असुर अब बढ़े हैं, करें नष्ट तपवन.
कहाँ तप करें अब, संत और सज्जन.
लखन औ विभीषण खड़े साथ ही हैं.
अगर है जरूरत, तो पार्थ भी है.
चढ़ाओ प्रत्यंचा, खड्ग को सम्हालो,
माँ काली, हे देवी, रिपु को खंगालो !
माँ काली, हे देवी, रिपु को खंगालो !

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 16, 2012 at 8:09am
आदरणीय जवाहरलाल जी !एक अच्छी
रचना के लिए बधाई।कथ्य की दृष्टि से
रचना बहुत ही अच्छी है।लेकिन शिल्प के
स्तर पर विश्रृंख्लित सी महसूस होती है।
लगता है,कहीं कहीं कुछ छूट रहा है।पहले
आपने कविता को अतुकांत लिखा बाद में
तुकांत।ये समझ में नहीं आया कि एक ही
रचना को दो तरह से क्यों लिखा गया।क्या
यह भी कोई नया प्रयोग है।
आपका अनुज हूं इसे अन्यथा मत
लीजिएगा।केवल एक सुझाव है,हालांकि
मुझे भी कविता को संदर्भ में अधिक
जानकारी नहीं है।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2012 at 12:33pm

सुन्दर, समीचीन, सार्थक.  प्रस्तुत प्रविष्टि हेतु सादर बधाई.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 15, 2012 at 12:24pm

माँ काली, हे देवी, रिपु को खंगालो !
माँ काली, हे देवी, रिपु को खंगालो !

सुन्दर भाव एवं प्रस्तुति. बधाई.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 15, 2012 at 10:39am

माँ भारती की करूण पुकार ने जहाँ हृदय को पसीजने पर विवश कर दिया वहीं ईश्वर के आह्वान ने ऊर्जा का संचार भी कर दिया| बहुत ख़ूब प्रिय जवाहर भाई| साभार,

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