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गजल : बात करने से ही बनती है बात दोस्तों.

बात करने से ही बनती है बात दोस्तों.
अब छोडो ये ख़ामोशी का साथ दोस्तों.
.

माना की बहूत दर्द है आज हमारे सीने में,
पर महज तड़प से नहीं बदलेगी,हालात दोस्तों,

कुछ ना पावोगे उम्मीदों की महफ़िल सजाने से,
जब तक हो ना उसपे अमल की बरसात दोस्तों.

कल का चेहरा दुनिया में देखा है किसने अबतक,

जो भी करना है कर दो अभी शुरुवात दोस्तों.

मरना है एक दिन सबको चाहे राजा हो या रंक,
फिर किसी से क्यों मांगे खैरात में हयात दोस्तों.

"नूरैन" जख्मों के शहर में दर्द का दवा नहीं मिलता,
खुद ही करना पड़ता है मरहम से मुलाकात दोस्तों.

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 25, 2012 at 10:54am

बहुत खूब नुरैन भाई , बिलकुल सही कहा है आपने ....बात करने से ही बनती है बात.....कहन की कसौटी पर प्रस्तुत रचना बहुत ही बढ़िया है, पर भाई ग़ज़ल की कसौटी पर यदि बात की जाय तो बात कुछ बन नहीं रही है, बात और साथ काफिया कैसे ? त और थ में तो अंतर है ना और भाई मीटर का क्या करे, एक बार फिर कसिये इसे, शायद बात बन जाए |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 24, 2012 at 8:59pm

bahut khoobकुछ ना पावोगे उम्मीदों की महफ़िल सजाने से,

जब तक हो ना उसपे अमल की बरसात दोस्तों.bahut pasan aaya ye sher.

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