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रिश्तॆ,,,,,, -----------------

दूर जब सॆ दिलॊं कॆ मॆल हॊ गयॆ ।

रिश्तॆ जैसॆ राई का तॆल हॊ गयॆ ॥१॥

जिननॆ दी रिश्वत नौकरी मिली,

डिग्रियां लॆ खड़ॆ थॆ फ़ॆल हॊ गयॆ ॥२॥

इरादॆ बहुत नॆक मगर क्या करॆं,

मंहगाई मॆं दब कॆ गुलॆल हॊ गयॆ ॥३॥

बॆमानी भ्रष्टाचार न मरॆंगॆ कभी,

बढ़ रहॆ हैं जैसॆ अमरबॆल हॊ गयॆ ॥४॥

बात की बात मॆं बदल जातॆ लॊग,

वादॆ जैसॆ बच्चॊं, कॆ खॆल हॊ गयॆ ॥५॥

नर और नारी रचॆ थॆ नारायण नॆ,

तरक्की करकॆ मॆल-फ़ीमॆल हॊ गयॆ ॥६॥

कवि-राज बुन्दॆली १८/०१/२०१२

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 24, 2012 at 12:10pm

आप की रचनाओं के इशारे और बिम्ब कभी-कभी वैचारिक रूप से अपने लिये ’स्पर्शज्या’ होते हैं.  परन्तु, निम्न तीन द्विपदियों पर मेरी दाद कुबूल करें -

बॆमानी भ्रष्टाचार न मरॆंगॆ कभी,

बढ़ रहॆ हैं जैसॆ अमरबॆल हॊ गयॆ

बात की बात मॆं बदल जातॆ लॊग,

वादॆ जैसॆ बच्चॊं, कॆ खॆल हॊ गयॆ

वाह ! वाह !! .. .

दूर जब सॆ दिलॊं कॆ मॆल हॊ गयॆ ।

रिश्तॆ जैसॆ राई का तॆल हॊ गयॆ  ...   इस मतले के सानी में ’राई का तेल’ किस बात को इशारा करता है ? या फिर,

इरादॆ बहुत नॆक मगर क्या करॆं,

मंहगाई मॆं दब कॆ गुलॆल हॊ गयॆ .. ..  में गुलेल क्या इंगित करता है ? महँगाई में ’दब’ के कुछ  का ’गुलेल होना’ क्या होता है ?

हम आपस में चर्चा करके बहुत कुछ सीखते हैं राज बुंदेला जी.

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 24, 2012 at 11:30am

धन्यवाद,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 21, 2012 at 4:32pm

//नर और नारी रचॆ थॆ नारायण नॆ,

तरक्की करकॆ मॆल-फ़ीमॆल हॊ गयॆ//

आय हाय, क्या बात है राज बुन्देली जी, अभी अभी हमारे एक मित्र फेस बुक पर एक चुटकुला प्रस्तुत किये है जरा देखे ....

A Boy After Spending dinner Time With His Girlfriend,
Saw A Guy's Ph0t0 In Her Bag..!!
.
He Asked : Is He Your Ex Boyfriend.. ??
.
.
.
Girlfriend Kissed Him & Said : "No Dear, That's Me Bef0re Surgery..!!"
=)))


सभी अशआर खुबसूरत है, दाद कुबूल करे | 

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