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समझ सॆ परॆ हैं हम,,,,,
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यॆ मत सॊच कि इतनॆ गिरॆ हैं हम ॥
फ़क्त तॆरॆ इक वायदॆ पॆ मरॆ हैं हम ॥१॥

हॊशियारी की हरियाली न दिखावॊ,
ऎसॆ तॊ तमाम सारॆ खॆत चरॆ हैं हम ॥२॥

दिल मॆं कैद कर लॆं तुम्हॆं क्यूं कर,
कानूनी अदालत कॆ कटघरॆ हैं हम ॥३॥

हमारी हस्ती कॊ तॊलतॆ हॊ तराजू पॆ,
क्या समझॆ बॆज़ान सॆ बटखरॆ हैं हम ॥४॥

नॆकियॊं का दामन नहीं छॊड़ा कभी,
चाहॆ ला्खॊं मु्सीबत मॆं घिरॆ हैं हम ॥।५॥

शैतान की परवाह नहीं है जी हमकॊ,
वॊ तॊ आज कॆ इंसान सॆ डरॆ हैं हम ॥६॥

हमारी बात कॊ दिल सॆ मत लगाना,
मिज़ाज़ सॆ सच जरा मसखरॆ हैं हम ॥७॥

तुम न समझॊगॆ इस दिल कॆ "राज",
तुम्हारी समझ सॆ बहुत परॆ हैं हम ॥८॥

कवि-राज बुन्दॆली,,,
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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2012 at 11:46pm

राजबुंदेली जी, आपने अच्छा बांधा है. इन दो भावों पर विशेष बधाई स्वीकारें - 

हॊशियारी की हरियाली न दिखावॊ,
ऎसॆ तॊ तमाम सारॆ खॆत चरॆ हैं हम ॥२॥

तथा 

हमारी हस्ती कॊ तॊलतॆ हॊ तराजू पॆ,
क्या समझॆ बॆज़ान सॆ बटखरॆ हैं हम ॥४॥

एक बेहतर और संजीदा कोशिश पर हार्दिक साधुवाद.
  

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 17, 2012 at 7:15pm

धन्यवाद,,,,्प्रभाकर भाई,,,,,,,,,,आभारी हूं आपका,,,,,,,


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 17, 2012 at 3:36pm

//हमारी हस्ती कॊ तॊलतॆ हॊ तराजू पॆ,
क्या समझॆ बॆज़ान सॆ बटखरॆ हैं हम //

वाह वाह वाह आदरणीय बुन्देली साहिब, जवाब नहीं. 

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