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कौन चीखता है तेरे जुल्मतों भरे हिसारों से।

समझ ना सका मैं तेरे दर पर लगी कतारों से,
रोशनी की उम्मीद कर बैठा गर्दिशमय सितारों से।

हमसफर ही तंग दिल मिला था मुझको,
किस कदर फरीयाद करता मैं इन बहारों से।

कौन रूकेगा इस सरनंगू शजर के नीचे,
जो खुद टिका हो बेजान इन सहारों से।

आंखों के आब को अजान देते रहते हैं जो,
लम्हा-लम्हा मांगता रहा समर इन रेगजारों से।

नामो-निशां भी मिटा चुका हूं तेरा इस दिल से,
तो किस कदर गुजरू तेरे दर के रहगुजारों से।

मेरी चाहत तो खला में खो चुकी है अब,
वक्त गुजर रहा है ”हर्ष” इन शुमारों से।

तुम्हारी खुशी का सीना किसने चीरा दिलावर,
कौन चीखता है तेरे जुल्मतों भरे हिसारों से।

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Comment

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Comment by sanjiv verma 'salil' on August 22, 2010 at 3:09pm
padbhar men ghat-badh hai. lay par dhyan den.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 22, 2010 at 9:11am
हर्ष जी इस परिवार में आपका हार्दिक अभिनन्दन है|
सुन्दर प्रयास है|वज्न पर ध्यान दें|

आप बीकानेर से है और बीकानेर साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति पर है|
धन्यवाद
Comment by Admin on August 21, 2010 at 10:45am
आदरणीय हर्ष वर्धन हर्ष जी, प्रणाम,
सर्वप्रथम ओपन बुक्स ऑनलाइन के मंच पर आपकी पहली रचना का ह्रदय से स्वागत है,एक अच्छी रचना दिया है आपने , उमीद है कि आगे भी अच्छी रचनायें और अन्य रचनाओं पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणियाँ मिलती रहेगी, धन्यवाद,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 21, 2010 at 10:08am
तुम्हारी खुशी का सीना किसने चीरा दिलावर,
कौन चीखता है तेरे जुल्मतों भरे हिसारों से।

बहुत खूब हर्ष वर्धन साहिब, अच्छी रचना दी है आपने, उर्दू के कठिन शब्दों का हिंदी अर्थ यदि नीचे मे लिख दे तो सबको समझने मे आसानी होगी, धन्यवाद,
Comment by आशीष यादव on August 20, 2010 at 11:58pm
प्रणाम,
वाह, क्या गज़ब की लाईने हैं| अति सुन्दर

कृपया ध्यान दे...

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