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(१)

जब आए - तो रस बरसाए

न आए - तो बड़ा सताए

कोई न ऐसा मनभावन 

ऐ सखी साजन?? न सखी सावन ।


(२)

मोरे पास - तो करे मगन

दूजे के संग - देत जलन 

न जग मे कोई वाके जैसा 

ऐ सखी साजन?? न सखी पैसा |

 

(३)

हमरे जीवन कै आधार

वो ही तो सगरा संसार

बड़ा सोच के रचिन रचैया 

ऐ सखी साजन?? न सखी मैया

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Comment

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Comment by Vikram Srivastava on September 23, 2011 at 3:51pm

बहुत बहुत शुक्रिया गुरु जी ....आपके मार्गदर्शन से ही यह संभव हुआ है....

 

यूँ तो आदत न थी कभी कह कर मुकरने की,

पर जाने क्यूँ आज कल ये भी भाने लगा है

टिवीटर, फेसबुक, ऑर्कुट चला के देखे है सब   

पर ओ बी ओ पर ज्यादा मज़ा आने लगा है |

Comment by आशीष यादव on September 23, 2011 at 3:27pm

tino kahmukariyan sundar hai. mujhe dusri bahut sahi aur achchhi lagi. tisri wali bhi sundar lgi.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 23, 2011 at 3:26pm

वाह वाह वाह भाई विक्रम श्रीवास्तव जी वाह ! कहमुकरी काव्य शिल्प को आपने न केवल बहुत अच्छे से समझा ही है बल्कि बहुत सुंदर रचनाएँ भी रच डालीं ! आपको इस विधा पर इतना सुंदर कहते हुए देख जितनी प्रसन्नता मुझे हुई है मैं शब्दों में ब्यान नहीं कर सकता ! तीनो कि तीनो कहमुकरियाँ कहन और शिल्प की द्रष्टि से अति उत्तम हैं ! कह कर मुकर जाना ही इस विधा की विशेषता है जिसका बखूबी निर्वहन हुआ है - आपको बहुत बहुत बधाई !

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