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आदमी क्यों इस क़दर मग़रूर है।

क्यों वह ताक़त के नशे में चूर है
आदमी क्यों इस क़दर मग़रूर है।

गुलसितां जिस में था रंगो नूर कल 
आज क्यों बेरुंग है बेनूर है।

मेरे अपनों का करम है क्या कहूं
यह जो दिल में इक बड़ा नासूर है।

जानकर खाता है उल्फ़त में फरेब
दिल के आगे आदमी मजबूर है।

उसको "मजनूँ" की नज़र से देखिये
यूँ लगेगा जैसे "लैला" हूर है।

आप मेरी हर ख़ुशी ले लीजिये
मुझ को हर ग़म आप का मंज़ूर है।

जुर्म यह था मैं ने सच बोला "सिया"
आज हर अपना ही मुझ से दूर है।

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Comment

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Comment by siyasachdev on September 19, 2011 at 4:33pm

janab Ganesh Jee "Bagi ji -aap ka kahe hue in khobsoorat alfaaz ke liyeshukria  aapki islah sar ankho par shukria.aapne pasand farmaya uske liye bahut shukraguzaar hun.nawazish hain aapki...salamati ho

Comment by siyasachdev on September 19, 2011 at 4:30pm

janab surender ratti ji..aapake khoobsurat comment ke liye bahut bahut shukria...nawazish hain aapki !!!salamati ho

Comment by siyasachdev on September 19, 2011 at 4:29pm

pradeep kumar sahni ji...zarraanawaazi aur hauslaa afzaai ka bahut bahut shukriya ...salamat rah

Comment by SURINDER RATTI on September 19, 2011 at 10:59am

सिया जी,  बहुत प्यारी ग़ज़ल है, बधाई स्वीकार करें - सुरिन्दर रत्ती - मुंबई

आप मेरी हर ख़ुशी ले लीजिये
मुझ को हर ग़म आप का मंज़ूर है।

जुर्म यह था मैं ने सच बोला "सिया"
आज हर अपना ही मुझ से दूर है।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 18, 2011 at 5:47pm

//क्यों वह ताक़त के नशे में चूर है
आदमी क्यों इस क़दर मग़रूर है।//

इंसान की फितरत को बयान करता खुबसूरत मतला |

//गुलसितां जिस में था रंगो नूर कल 
आज क्यों बेरंग है बेनूर है।//

प्रश्नवाचक शे'र, मिसरा उला को मिसरा सानी द्वारा अनुमोदित होना चाहिए था अर्थात यदि बेनूर भी है तो उसका कारण स्पष्ट हो तो क्या कहने |

//मेरे अपनों का करम है क्या कहूं
यह जो दिल में इक बड़ा नासूर है।//
जबरदस्त, खुबसूरत कहन, जोरदार प्रेषण |


//जानकर खाता है उल्फ़त में फरेब
दिल के आगे आदमी मजबूर है।//

सही कह रही है आदरणीया, दिमाग और दिल कभी कभी अलग अलग कासन देने लगते है और अधिकांशतः हम दिल से हार जाते है, खबसूरत शे'र |

//उसको "मजनूँ" की नज़र से देखिये
यूँ लगेगा जैसे "लैला" हूर है।//

वाह वाह, क्या बात कही है, बात भी सही है, खूबसूरती तो इंसान की नज़रों में है |

//आप मेरी हर ख़ुशी ले लीजिये
मुझ को हर ग़म आप का मंज़ूर है।//

यह हुआ प्यार में हार कर भी जीतना, यह शेर भी जोरदार है |

//जुर्म यह था मैं ने सच बोला "सिया"
आज हर अपना ही मुझ से दूर है।//

वाह वाह वाह, क्या कहने, सच कभी परास्त नही होता, खुबसूरत मकता, दाद कुबूल करे आदरणीया |

Comment by Brij bhushan choubey on September 16, 2011 at 4:17pm

अच्छी गजल है |

Comment by Abhinav Arun on September 16, 2011 at 2:07pm

जुर्म यह था मैं ने सच बोला "सिया"
आज हर अपना ही मुझ से दूर है।

अच्छा शेर !! बहुत ही प्रभावी ग़ज़ल ! सिया जी को हार्दिक बधाई !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 16, 2011 at 3:10am

निम्नलिखित उम्दा कहन पर मेरी हार्दिक बधाई..

मेरे अपनों का करम है क्या कहूं
यह जो दिल में इक बड़ा नासूर है।

जानकर खाता है उल्फ़त में फरेब
दिल के आगे आदमी मजबूर है।

उसको "मजनूँ" की नज़र से देखिये
यूँ लगेगा जैसे "लैला" हूर है।

 

वाह !

Comment by वीनस केसरी on September 16, 2011 at 1:05am

मेरे अपनों का करम है क्या कहूं
यह जो दिल में इक बड़ा नासूर है।

जानकर खाता है उल्फ़त में फरेब
दिल के आगे आदमी मजबूर है।

 

 

वाह वा खूबसूरत कहन के लिए आपको हार्दिक बधाई

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