दोहा सप्तक. . . . . युद्ध
हरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।
बेबस जनता भोगती , इसका हर अंजाम ।।
दो देशों के मध्य जब, होता है संग्राम ।
जाने कितने चेहरे , हो जाते गुमनाम ।।
कौन करेगा आकलन , कितना हुआ विनाश ।
मौन भयंकर छा गया, काला हुआ प्रकाश ।।
जंग चलेगी जब तलक, होगा बस संहार ।
खण्डहरों के ढेर पर, सब होंगे लाचार ।।
जन-धन का हर युद्ध में, होता है नुकसान ।
हार- जीत के द्वन्द्व में, हारे बस इंसान ।।
देख विदारक दृश्य को, दिया युद्ध को रोक ।
नीति जिसने युद्ध की, छोड़ी बना अशोक ।।
कभी न होता युद्ध से, भला किसी का यार ।
जीत हार के खेल में, देश मिटे हर बार ।।
सुशील सरना / 13-3-26
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