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दोहा सप्तक. . . पतंग

दोहा सप्तक . . . . पतंग

आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।
बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।। 

 

बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।
आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।

 

कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।
डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।

 

नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।
जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।

 

जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।
उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग ।।

 

किसी धर्म की है हरी, किसी धर्म की लाल ।
आसमान में खो गए,  ऐसे सभी सवाल ।।

  

सुघड़ हाथ में डोर तो, छूती  मेघ पतंग ।
गलत हाथ में जो गई, आहत  होते अंग ।।

 
सुशील सरना / 14-1-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on February 18, 2025 at 9:10pm

आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से सम्मानित करने का दिल से आभार आदरणीय 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 14, 2025 at 5:05pm

आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।
बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।। 

आदरणीय सुशील सरनाजी, बहुत खूब.. बहुत खूब.. 

हार्दिक बधाइयाँ 

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