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दोहा सप्तक. . . . सावन

दोहा सप्तक . . . . सावन

सावन में  अच्छी नहीं, आपस की तकरार ।
प्यार जताने के लिए, मौसम हैं दो चार ।।

बरसे मेघा झूम कर, खूब हुई बरसात ।
बाहुबंध में बीत गई, भीगी-भीगी रात ।।

गगरी छलकी नैन की, जब बरसी बरसात।
कैसे बीती क्या कहूँ, बिन साजन  के  रात।।

थोड़े    से   जागे    हुए, थोड़े   सोये   नैन ।
हर करवट पर धड़कनें, रहती हैं बैचैन ।।

बिन साजन सूनी लगे, सावन वाली रात ।
सुधि   सागर   ऐसे   बहे, जैसे बहे प्रपात ।।

 जितनी बरसें बारिशें, उतनी  भड़के आग ।
सावन में भाता नहीं, अधरों को बैराग ।।

तन्हा भीगी मैं यहाँ, तन्हा बीती रात ।
तन्हाई में आ गई, याद अधर सौगात ।।

सुशील सरना / 1-8-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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