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दोहा पंचक. . . .

साथ श्वांस के रुक गया, जीवन का संघर्ष ।
आँचल अंक विषाद के, मौन हुआ हर हर्ष ।।

जैसे-जैसे दिन ढले, लम्बी होती छाँव ।
काल समेटे जिन्दगी, थमते चलते पाँव ।।

इच्छाओं की आँधियाँ, आशाओं के ढेर ।
क्या समझेगी जिन्दगी, साँसों का यह फेर ।।

पगडंडी पक्की हुई, क्षीण हुए सम्बंध ।
अर्थ क्षुधा में खो गई, एक चूल्हे की गंध ।।

पत्थर सारे मील के, सड़क किनारे मौन ।
अपने अन्तिम अंक को, पढ़ पाया है कौन ।।

नैनों की मनुहार को, नैन करें स्वीकार ।
मौन आग्रह शीत में, कौन करे इंकार ।।

देह काँपती शीत में, मुख से निकले भाप ।
अधरों के अनुरोध पर, अधर मिलें फिर आप  ।।

वर्तमान सन्दर्भ में, न्यून हुए परिधान ।
पीढ़ी समझे  आज की, इसको अपनी शान ।।

सर्व विदित संसार में, कुछ भी गया न साथ ।
फिर भी बन्दा अर्थ को, माने अपना नाथ ।।

दाता तेरे खेल को, जान सका है कौन ।
अभिमानी हर शोर को, पल में करता मौन ।।

काया का अभिमान जब, मिले मृदा के संग ।
साथ चिता के भस्म हों, नकली जीवन रंग ।।

हम जानें संसार में, सबको अपने साथ ।
संचित सब छूटे यहाँ, खाली रहते हाथ।।

कब लौटा है अर्श से, जाने वाला मित्र ।
यादों का बस फलसफा,बनता उसका चित्र ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on January 8, 2024 at 2:51pm
आदरणीय जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार। नूतन वर्ष की आपको हार्दिक बधाई और हार्दिक शुभकामनाऐं सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 1, 2024 at 12:30pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। अच्छे दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।

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