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किसे अपना कहेंं हम यहाँ

किसे अपना कहें हम यहाँ 

खंजर उसी ने मारी जिसको गले लगाया 

किससे कहें हाल-ए-दिल यहाँ 

हर राज उसी ने खोला जिसे हमराज़ बनाया 

किसे जख्म दिखाये दिल का 

हार घाव उसी ने कुरेदा जिसको भी मरहम लगाया 

किसे साथी समझे अपना यहाँ 

मेरी जमीन उसी ने खींची जिसको कंधे पर बैठाया 

किसी चुने हमसफर अपना 

गड्ढा उसी ने खोदा जिसको रास्ता दिखलाया 

किसे बनाए मीत यहाँ 

मौके पर पीठ दिखाया जिसपर सबकुछ लुटाया

किससे करें उम्मीद यहाँ 

निवाला उसी ने छिना जिसको भूखा ना सुलाया 

कौन रहेगा साथ यहाँ

हर डोर उसी ने तोरी जिसको माला पहनाया 

किससे मांगे हम पनाह 

हर पर्दा उसी ने उठाया जिसको सबसे बचाया 

किससे सच की उम्मीद करें 

झूठा उसी ने बनाया बोलना जिसको सिखलाया   

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

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Comment by Dr. Vijai Shanker on November 8, 2023 at 8:14pm

आदरणीय अमन सिन्हा जी , बहुत ही सार गर्भित , व्यंगात्मक और ज्ञानवर्धक प्रस्तुति के लिए ह्रदय से बधाई, सादर ,

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2023 at 8:24pm
वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति सर

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