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दोहा त्रयी : मजबूर

दोहा त्रयी. . . . मजबूर

आँखों से ही दूर है, अब  आँखों का नूर ।
बदले इस परिवेश में, ममता है मजबूर ।।

वर्तमान ने दे दिया, माना धन भरपूर ।
लेकिन कितना कर दिया, मिलने से मजबूर ।।

धन अर्जन करने चला, सात समंदर पार ।
मजबूरी ने कर दिया, सूना घर संसार ।।

सुशील सरना / 18-8-23

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on September 7, 2023 at 4:00pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 2, 2023 at 4:22pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। अच्छे दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई। 

Comment by Sushil Sarna on August 20, 2023 at 11:20am
आदरणीय अमीरूद्दीन जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से सम्मानित करने का दिल से आभार
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 19, 2023 at 8:09pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, विदेशों में विशेषकर मज़दूरी को गये कामगारों के परिवार की मजबूरी का भावनात्मक चित्रण आपने सुंदर ढंग से अपने 'दोहा त्रयी' के माध्यम से किया है, जिसके लिए बधाई स्वीकार करें। 

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