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दोहा सप्तक- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

जलते दीपक कर रहे, नित्य नये पड्यंत्र।
फूँका उन के  कान  में, तम ने कैसा मंत्र।१।
*
जीवनभर  बैठे  रहे, जो  नदिया  के तीर।
भाँणों ने उनको लिखा, मझधारों के वीर।२।
*
करती हो पतवार जब, दुश्मन सा व्यवहार।
कौन  करे  उम्मीद  फिर, नाव  लगेगी पार।३।
*
दुख के अपने रंग हैं, दुख की अपनी चाल।
जिसके चंगुल में हुए, जग में सभी निढाल।४।
*
लूले-लँगड़े सुख  सकल, साध  रहे  नित मौन।
आगे बढ़कर फिर भला, दुख को कुचले कौन।५।
*
दुख के जनपद हैं बहुत, सुख का एकल गाँव।
कितना चुनकर फिर  रखें, घर  से बाहर पाँव।६।
*
पथ जो भी अब प्यार के, बस काटों की खोह।
जहाँ मिलन से है अधिक, पसरा हुआ बिछोह।७।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 1, 2023 at 10:26pm

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। दोहे के बारे में सुझाव अच्छा है। इसे संशोधित रूप में इस प्रकार देखें । सादर...

"उसके चंगुल में सभी, फँसकर हुए निढाल।"

Comment by Chetan Prakash on June 1, 2023 at 1:34pm

सार्थक दोहे हुए, भाई मुसाफिर साहब ! हाँ, चौथे दोहे तीसरे चरण में, संशोधन अपेक्षित है, 'उसके चंगुल जो हुए', करने से दोहा बेहतर हो जाएगा, बंधु !

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