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हर जंगल को नित्य मिटाने(गजल)- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

आँखों में घड़ियाली  आँसू  अधरों पर चिंगारी हो
उन लोगों से बचके रहना जिनमें ढब हुशियारी हो।१।
*
सिर्फ जरूरत भर को लोगो पेड़ काटना अच्छा है
हर जंगल को नित्य मिटाने क्यों हाथों में आरी हो।२।
*
सभी पीढ़ियों कई युगों की यही धरोहर इकलौती
सिर्फ तुम्हारी एक जरूरत क्यों धरती पर भारी हो।३।
*
अल्प जरूरत अति बताकर नष्ट करो मत धरती
आज कहीं तो सुन्दर अच्छे आगत की तैयारी हो।४।
*
हरपल सुखमय स्वर्ग सरीखा कैसे नहीं रहेगा तब
जीवन की आधारशिला जब धरती जैसी नारी हो।५।
*
तुम पुरखों की माफी माँगो माँफ करेंगे हम भी अब
क्यों बदले की आग जलाकर हर पीड़ी हत्यारी हो।६।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2023 at 7:59pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Sushil Sarna on February 19, 2023 at 3:22pm
वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति सर हार्दिक बधाई सर

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