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ग़ज़ल - थामती नहीं हैं पलकें अश्कों का उबाल तक (ज़ैफ़)

 212 1212 1212 1212 

थामती नहीं हैं पलकें अश्कों का उबाल तक

भूल-सा गया है दिल भी, धड़कनों की ताल तक 

दो दिलों की दास्ताँ न कोई समझा है यहाँ 

अपना इश्क़ आ ही पहुँचा जुर्म के मलाल तक 

ऐ ख़ुदा, रखूँ मैं तुझसे रहमतों की आस क्या

मैं पहुँचता ही नहीं कभी तेरे ख़याल तक 

हाय! आ रहा है प्यार झूठे ग़ुस्से पर तेरे 

लाल शर्म से पड़े हैं यार, तेरे गाल तक 

आशना तुझे कहा है मैंने जाने किसलिए

पूछता तो है नहीं कभी तू मेरा हाल तक 

घर की चीज़ें बिक रही हैं रोटियों के वास्ते

अब सड़क पे आन बैठिएगा अगले साल तक 

ये कफ़न तो दूर 'ज़ैफ़', अब तो बाद-ए-मर्ग भी

हम ग़रीबों के नसीब में नहीं, रुमाल तक

(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Zaif on February 5, 2023 at 8:49pm

आ. बृजेश जी, बहुत आभार आपका।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 25, 2023 at 6:09pm

अच्छी ग़ज़ल कही भाई जैफ...बधाई

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