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गीत - ५ ( लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

कह रहे हैं आज हम भी तानकर सीना।
प्रीत ने चलना सिखाया, प्रीत ने जीना।।
*
थे भटकते  फिर  रहे  पथ में अकेले।
आप आये तो जुड़े हम से बहुत मेले।।
था नहीं परिचय स्वयं से, तो भला क्यों।
कौन अनजाना बुलाता आन सुख लेले।।
*
पीर ही थाती हमारी बन गयी थी पर।
आप की मुस्कान ने हर दर्द है छीना।।
*
हर चमन के फूल मसले शूल से खेले।
हम रहे अब तक महज संसार में ढेले।।
नेह के हर बोध  से  अनजान जीवनभर।
वासना की कोख में नित क्या नहीं झेले।।
*
थे समझ पाये नहीं सच बिन तुम्हारे ये।
वासना औ' प्रीत में अन्तर बहुत झीना।।
*
हो गये थे लोक  में पाषाण जैसे हम।
भूल बैठी थी हमारी आँख होना नम।।
थे शिखर पर किन्तु यश से हीन जैसे।
हो गया ऊँचा हमारा आप से परचम।।
*
आपकी मनुहार से ही जिन्दगी में हम।
सीख पाये मुश्किलों से प्रेम रस पीना।।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 21, 2022 at 8:37pm

आ. भाई जैफ जी, हार्दिक आभार।

Comment by Zaif on November 18, 2022 at 7:34pm

आ. लक्ष्मण सर, बहुत ख़ूब। वाह।

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