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2122 - 2122 - 2122 - 212

वो जो हम से कह चुके वो हर बयाँ महफ़ूज़ है

दास्तान-ए-ग़ीबत-ए-कौन-ओ-मकाँ महफ़ूज़ है 

मुश्त'इल करने की हम को कोशिशें कितनी हुईं

लो हमारे दिल में देखो सब यहाँ महफ़ूज़ है 

हक़-बयानी जिसका शेवा हो कभी झुकता नहीं 

दार तक रंग-ए-रुख़-ए-ताब-ओ-तवाँ महफ़ूज़ है 

ज़ब्त कहते हैं जिसे वो है समंदर में कहाँ 

ये उलट देता है सब-कुछ जो जहांँ महफ़ूज़ है 

ज़र्फ़ ये बख़्शा है रब ने हज़रत-ए-इन्सान को 

इसके दिल में एक बहर-ए-बे-कराँ महफ़ूज़ है 

ज़र्फ़ वालों की ख़मोशी कोई कमज़ोरी नहीं 

इस ख़मोशी में ग़ज़ब की कहकशांँ महफ़ूज़ है

कह चुके जो बात दिल की तुम हवाओं से 'अमीर'

क्या सबा और बर्ग-ओ-गुल के दर्मियाँ महफ़ूज़ है? 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 3, 2022 at 5:49pm

आदरणीय सुशील कुमार सरना जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का तह-ए-दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on October 3, 2022 at 4:41pm
वाह आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब बहुत खूबसूरत सृजन हुआ है सर । हार्दिक बधाई सर

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