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जिम्मेदार इंसान-एक सम्पूर्ण परिवार

अंधा, बहरा कभी गूंगा बनता

रिश्तों की जिसको परवाह हो

मान-अपमान का भोग भी करता

चिंतित रहता, परिवार पर उसके कलंक न हो।।

 

सोच-समझकर सही फैसले लेता

ताकि घर में कलह न हो

उत्तरदायित्व भी लेता हरदम

फैसलों में उसके कभी दो राय न हो।।

 

शान-शौकत सब भूलता अपनी

पद-प्रतिष्ठा का भी अभिमान न हो

सबकी खुशी में उसकी खुशी है

चाहे किए त्याग का नाम न हो।।

 

होती जिम्मेदारियां बड़ी है उसकी

जग में चाहे पहचान न हो

काम तो उसको करना पड़ता

चाहे शरीर में जान न हो।।

 

थकान, पीड़ा क्या रोकेगी उसको

जब, कमानेवाला कोई और न हो

परिवार की खुशियां प्रथम लक्ष्य

चाहे मंजिल का उसे कोई ज्ञान न हो।।

 

कभी गिरता कभी संभलता

उसमें, अदम्य साहस की कमी न हो

काटों भरा है उसका जीवन

पर, अनुभव की उसमें कमी न हो।।

 

 

स्वरचित व मौलिक

फूल सिंह, दिल्ली

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 3, 2022 at 3:51pm

आ. भाई फूलसिंह जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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