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इन के बिना तो व्यर्थ है सँस्कार मजहबी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"


२२१/२१२१/१२२१/२१२
*
खंडित करे न देश को तलवार मजहबी
आँगन खड़ी न कीजिए दीवार मजहबी।।
*
मन्शा उन्हीं की देश को हर बार तोड़ना
करते रहे हैं लोग  जो  व्यापार मजहबी।।
*
जीवन न जाने कितने ही बर्बाद कर रहा
इन्सानियत से  दूर  हो  सन्सार मजहबी।।
*
माटी का मोल प्रेम की भाषा भी साथ हो
इन के बिना तो व्यर्थ है सँस्कार मजहबी।।
*
समरसता ज्ञान और न आपस का मेल है
बच्चों को जो भी देते हैं आधार मजहबी।।
*
करती नहीं है धर्म का कोई भी काम वो
कहने को चाहे आपकी सरकार मजहबी।।
*
ठाने  हुए  हैं  रक्त  से  भर  देंगे  हर नदी
इस पार मजहबी हैं तो उस पार मजहबी।।
*
अब हैं लड़ाते लोक को अपने हिसाब से
मजहब का अर्थ भूल के दो चार मजहबी।।
*
भाता नहीं है और का उसको तनिक भी रंग
कहता है मुझ सा तू भी हो गुलदार मजहबी।।
**
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 23, 2022 at 7:07pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Sushil Sarna on June 23, 2022 at 4:30pm
वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत सुंदर और सार्थक प्रस्तुति है सर ।हार्दिक बधाई सर

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