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मेरे  अपनों  का  ही खंजर मेरी तलाश में है ।

जिन्हें बनाया था अफसर मेरी तलाश में है ।।

जड़ों को सींच रहा हूँ शुरू से ओ बी ओ की,

नये  आए हैं  वो  चाकर  मेरी तलाश  में हैं ।

जताते झूूठा वो हक़ जो ग़ज़ल की शोहरत पर,

उन्हीं  के  हाथ  का  पत्थर  मेरी  तलाश में है ।

बहुत गुमान है उनको तो जन्म के शहर का,

नगर का हूँ  मैं तो रहबर  मेरी  तलाश  में हैं ।

जहाँ में सच के सहारे अभी  कोई तो रहे,

कि  घर में हूँ कोई बाहर मेरी तलाश में है ।

जिसे उठा के हमीं ने फलक पे टाँका था ,

सितारा जो रहा नौकर मेरी तलाश में है ।।

अभी बदल तो रही ज़िन्दगी ज़रा 'चेतन' 

पता मुझे है वो हद कर मेरी  तलाश में है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

प्रोफ. चेतन प्रकाश 'चेतन'

 

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Comment by Chetan Prakash on August 31, 2021 at 9:33pm

मतले के सानी मिसरे में है, के स्थान पर है ं, गलत टंकित हुआ है, इसका मुझे खेद है, आदरणीय  ! 

Comment by Chetan Prakash on August 31, 2021 at 9:29pm

नमस्कार, सुशील सरना साहब, आपने उत्साह बढ़ाया, ग़ज़ल आपको अच्छी लगी, आपका आभारी हूँ! 

Comment by Chetan Prakash on August 31, 2021 at 9:25pm

आदरणीय, रवि शुक्ला जी नमन, स्पष्ट और विस्तार से अपनी बात कहे, आभारी हूँ गा, ! सादर  

Comment by Sushil Sarna on August 31, 2021 at 11:50am
वाह खूबसूरत अहसासों की शानदार गजल । हार्दिक बधाई सर
Comment by Ravi Shukla on August 26, 2021 at 12:25pm

आदरणीय चेतन प्रकाश जी  ग़ज़ल की अच्छी कोशिश हुई है मगर एक दो जगह बह्र खारिज हो रही है तो मतले में रदीफ बदल रहा है । नजर−ए−सानी  कीजियेगा । सादर 

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