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तेरे आकर्षण का पल पल प्रतिकर्ष सताता है

सामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //

नदिया के पास जाऊं तो शीतल हो जाऊं

साथ दो अगर तो मैं मुस्कान बन जाऊं //

आकर्षक सा छद्म आव्हान मुझे बुलाता है //

सामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //

तुमसे कहने का मैं कोई मौका न छोड़ता

बस एक इशारा मिलता तो ही तो बोलता //

ऊहा पोह के सागर में अब गोता खाता हूँ

सामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //

दर्द की बात न करूंगा दर्द अब बेमानी हुआ

चाय की चुस्की में मैं इसको बिसराता हूँ //

तुम्हारा साथ पा जाऊँ खुदा से मिल जाऊं

सामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //

एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त [ काव्यात्मक नाम ]

डॉ अरुण कुमार शास्त्री [ सांसारिक नाम ]

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by Samar kabeer on February 9, 2021 at 5:43pm

जनाब डॉ.अरुण कुमार शास्त्री जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2021 at 7:15am

आ. भाई अरुण जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

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