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जिस इश्क में दिल्लगी नही होती 

उस इश्क की तो जानू  उमर भी नही होती

सिलसिला साँसों का जिस रोज़ थम गया 

रौशनी गई दिये से और प्यार मर गया

धड़कन में अगर खून की लाली नही होती 

उस इश्क की तो जानू  उमर भी नही होती

दिखावा प्यार का तुम खूब कर चुके 

दे दे के तोहफे प्यार में मिरा घर भर चुके

सेंकडो तो आने जाने के बहाने कर चुके 

जोश था जो मिलन का वो आज मर चुका

जिस इश्क में दिल्लगी नही होती 

उस इश्क की तो जानू  उमर भी नही होती //

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 23, 2020 at 5:29pm

आ. भाई अरुण कुमार जी, सादर अभिवादन । सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on September 23, 2020 at 12:06pm

जनाब डॉ. अरुण कुमार जी आदाब, अच्छी कविता लिखी आपने, बधाई स्वीकार करें ।

निवेदन है कि रचना के साथ उसकी विधा भी लिख दिया करें ताकि कुछ कहने में आसानी हो ।

कृपया ध्यान दे...

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