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दिल मेरा यह हाल देख घबराता है

शहर का अब मजदूरों से क्या नाता है।

खून पसीने से अपने था सींचा जिसको
बुरे दौर में दामन शहर छुड़ाता है।

आया संकट कोरोना का देश में जबसे
सड़कों पर लाचार मनुज दिख जाता है।

जिसने चमकाया शहरों को हो लथपथ
आज वही शहरों से फेंका जाता है।

देख दर्द होता है दिल में अब अवनीश
दुनियां को रचता क्या एक विधाता है।

मेहनत करने वाला क्यूँ दर दर भटके
क्यूँ नेता साहब सेठ ऐंठ दिखलाता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

अवनीश

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Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on June 4, 2020 at 7:42am

आदरणीय अवनीश जी विल्कुल यथार्थ चित्रण किया है बहुत बहुत बधाई

Comment by Samar kabeer on June 2, 2020 at 3:07pm

जनाब अवनीश जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

एक निवेदन ये है कि रचना के साथ उसकी विधा भी लिख दिया करें,इससे रचना के बारे में कुछ कहना आसान हो जाता है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 2, 2020 at 12:50pm

आ. भाई अनीश जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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