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कोरोना पर छप्पय छंद में कुछ रचनाएँ

(सूत्र रोला + उल्लाला = छप्पय छंद)

लेकर लाखों पाँव, एक आया संहारी
चुप सारे दरवेश, पादरी सन्त पुजारी
जीवन गति अवरूद्ध, क्रुद्ध हों ईश्वर जैसे
नहीं किसी को ज्ञान, कटे यह विपदा कैसे
दिखे नहीं उम्मीद अब, मंदिर मस्जिद धाम से
आज सभी भयभीत हैं, कोरोना के नाम से।।1

जिव्हा का कुछ स्वाद, पड़ा हम सब पर भारी
खाया जो आहार, उसी ने दी बीमारी
पर अपना क्या दोष, चीन यह समझ न पाया
खाकर कुत्ता गिद्ध, भयंकर रोग बुलाया।।
जिससे जग गति थम गई, डर फैला अंजान सा
उसमें भी सन्देश पर, मनुज नहीं भगवान सा।।2

अब भी होती सुब्ह, तनिक पर अलसाई सी
वन उपवन की महक, मस्त मधु अमराई सी
चिड़ियाँ करतीं शोर, निडर हो मेरे छत पर
बुलबुल, मैना मोर, नृत्य करने को तत्पर
मस्त हुए वन जीव सब, पस्त भले इंसान है
समय चक्र बदलाव का, बस कुदरती विधान है।।3

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 2, 2020 at 6:19pm

आद0 छोटे लाल भैया जी सादर अभिवादन। आपके स्नेहमयी प्रतिक्रिया का कोटिश आभार

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 2, 2020 at 6:18pm

आद0 लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन। आभार आपका

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 2, 2020 at 6:17pm

आद0 तेजवीर सिंह जी सादर अभिवादन। आपकी उपस्थिति और प्रतिक्रिया के लिए कोटिश आभार

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on May 1, 2020 at 11:50am

भाई सुरेंद्र नाथ सिंह जी आप हर विधा के मजे हुए कवि हैं आपकी इस सुंदर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 30, 2020 at 4:58pm

आ. भाई सुरेन्द्र जी, बेहतरीन छंद हुए है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 29, 2020 at 5:55pm

हार्दिक बधाई आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी। बेहतरीन छंद।

जिससे जग गति थम गई, डर फैला अंजान सा
उसमें भी सन्देश पर, मनुज नहीं भगवान सा।।2

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