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दरवाजे पर दस्तक हुई और आवाज आयी 'दीदी, मैं आयी हूँ".
उसने आवाज पहचान लिया और दरवाजा खोल दिया. बाई अंदर आयी और नमस्ते करके खड़ी हो गयी.
"कैसी हो बाई, घर में सब ठीक है ना?, उसने पूछ तो लिया लेकिन उसे अपनी आवाज ही खोखली लग रही थी.
"सब ठीक ही है दीदी, क्या कहें?, बाई ने कुछ नहीं कहते हुए भी सब कुछ कह दिया.
"अच्छा ये लो पैसा, थोड़े ज्यादा पैसे भी दे दिया हैं. अपना ख्याल रखना", उसने बाई के हाथ में पैसे रख दिए.
बाई ने पैसे वैसे ही अपने छोटे से पर्स में रख लिए. वह पलट कर जाने लगी तभी बाई ने पूछा "जब यह बंदी ख़तम होगी तब मैं काम पर आ जाऊँ न दीदी?
उसने गहरी सांस ली और कहा "अभी काम पर मत आना, मैं बताउंगी तब आना. लेकिन तुमको पैसा मिलता रहेगा, चिंता मत करना".
बाई ने अपने हाथ जोड़ दिए, उसकी आँखों में कृतग्यता जैसे टपक रही थी.
उसने बाई को जाने का इशारा किया, बाई पलटते पलटते रुकी और उसने कातर आवाज में कहा "काम पर जब भी बुलाना हो दीदी, मुझे ही बुलाना".
बाई जा चुकी थी, वह सन्न खड़ी सोच रही थी.
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on April 22, 2020 at 12:25pm

इस हौसला बढ़ाने वाली टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ लक्ष्मण धामी 'मुसाफिरजी

Comment by विनय कुमार on April 22, 2020 at 12:24pm

इस हौसला बढ़ाने वाली टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ तेज वीर सिंह जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 22, 2020 at 7:07am

आ. भाई विनय जी, समयसायिक परिप्रेक्ष में बेहतरीन कथा हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 21, 2020 at 5:42pm

हार्दिक बधाई आदरणीय विनय जी। सम सामयिक समस्या को दर्शाती एक बेहतरीन लघुकथा। एक कड़वी सच्चाई सम्मुख है कि एक अदृश्य भय के साये में जी रहा है आज का मजदूर,एक दैनिक भोगी, एक अनियमित कामगार और भी अनेक उसी प्रकार के लोग। पता नहीं कब बोल दिया जाय कि कल से मत आना।

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