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अंतस के हिम निर्झर से जब भाव पिघलने लगते है|(७९ )

अंतस के हिम निर्झर से जब
भाव पिघलने लगते है|
गीतों में ढलने को मेरे
शब्द मचलने लगते हैं ॥
***
लेखन आता नहीं मुझे पर लिखता हृद उद्गारों को |
और बुझा लेता हूँ लिखकर हिय तल के अंगारों को |
कहाँ निभा पाता हूँ अक्सर मैं छंदो का अनुशासन
अलंकार-से भूल गया हूँ शब्दों के श्रृंगारों को |
भाषा शुद्ध न हुई भले ही
लय सुर ताल रहे बाक़ी
बिम्ब-प्रतीक सृजन से जब भी
भाग निकलने लगते हैं |
गीतों में ढलने को मेरे
शब्द मचलने लगते हैं ॥
***
लिखना मुश्किल है भावों को कहना सदा सरल होता |
आखों में अविरल आँसू हो दिल जब कभी तरल होता |
सृजन कार्य शब्दों को केवल नहीं सजाना है क्रम में
अमृत-पान की अभिलाषा में पीना यहाँ गरल होता |
अंत दर्द का होता जिस पल
हृदय द्वार लौटे खुशियाँ
अनायास जब मन आँगन में
दीपक जलने लगते हैं |
गीतों में ढलने को मेरे
शब्द मचलने लगते हैं ॥
***
पहले केवल अवचेतन में एक सुक्ष्म आकार बने |
भावों से जब मिले कल्पना तो लेखन-आधार बने |
विस्तारित जब हुए भाव तो पंख पसारें नभ छूने
बहने लगे भाव निर्झर तब स्वयं गीत साकार बने |
कुछ अनजाने कुछ पहचाने
दृश्य उभरते जेहन में
और हृदय में जब जब नूतन
सपने पलने लगते हैं |
गीतों में ढलने को मेरे
शब्द मचलने लगते हैं ॥
***
अंतस के हिम निर्झर से जब
भाव पिघलने लगते है|
गीतों में ढलने को मेरे
शब्द मचलने लगते हैं ॥
***
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी |

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 2, 2020 at 7:59pm

सादर आभार आदरणीय Dayaram Methani जी 

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 2, 2020 at 7:58pm

सादर आभार आदरणीय Samar kabeer साहेब | 

Comment by Samar kabeer on April 2, 2020 at 7:25pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Dayaram Methani on April 2, 2020 at 7:19pm

आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी, अति सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकार करें।

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