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किसी की याद में ज़ख्मों को दिल मे पालते रहना,
तबाही का ही रस्ता है यूँ शोलों पर खड़े रहना।

न जाने कौन से पल में कलम गिर जाए हाथों से,

मगर तुम आखिरी पल तक ग़ज़ल के सामने रहना।

जहाँ पर शाम ढलती है वहाँ पर देखकर सोचा,
मेरी यादों में रहकर तुम यूँ ही मेरे बने रहना।

वो आएं या न आएं ये तो उनकी मर्जी है लेकिन,
मुहब्बत की है तो बस रास्ते को देखते रहना।

किसी सूरत भी मेरा दिल बहल सकता नहीं फिर भी,
तकल्लुफ का तकाज़ा है तबीअत पूछते रहना।

लगाकर आग तुम खुश हो रहे हो जिस बगीचे में,
उसी की राख में तुम उम्र भर तन्हा दबे रहना।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on March 7, 2020 at 2:52pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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