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ग़ज़ल-4 (सब परिंदे लड़ रहे हैं...)

2122 2122 2122 212

सब परिंदे लड़ रहे हैं, आसमां भी कम है' क्या
इन सभी के हाथ में अब मज़हबी परचम है' क्या //१

क्यूँ सभी के अम्न के, क़ातिल बने हो रहबरों
घर चलाने के लिए घर में कहीं कम ग़म है क्या //२

एक क़तरा अश्क भी जो दे नहीं, वो हमसफ़र
दर्द से जो रोज़ खेले वो भला हमदम है क्या //३

दर्द से व्याकुल मरीज़ों के बने थे चारागर
जो दवा नासूर कर दे वो भला मरहम है क्या //४

जल रही हो जब ये धरती जल रहा हो जब चमन
ऐसे में जब आग बरसे ये भला मौसम है क्या //५

-- क़मर जौनपुरी

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by TEJ VEER SINGH on November 18, 2018 at 12:39pm

हार्दिक बधाई आदरणीय क़मर जौनपुरी जी। बहुत सुंदर गज़ल।

दर्द से व्याकुल मरीज़ों के बने थे चारागर
जो दवा नासूर कर दे वो भला मरहम है क्या //४

Comment by राज़ नवादवी on November 18, 2018 at 10:35am

जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें. सादर 

Comment by क़मर जौनपुरी on November 17, 2018 at 11:21pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब अजय तिवारी साहब हौसला आफ़ज़ाई के लिए। ऐसे ही इस्लाह का सिलसिला बनाये रखिये।

Comment by Ajay Tiwari on November 17, 2018 at 5:16pm

आदरणीय कमर साहब, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by क़मर जौनपुरी on November 16, 2018 at 3:27pm
इस्लाह के लिए बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब समर कबीर साहब।
Comment by Samar kabeer on November 16, 2018 at 3:07pm

जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

दे दवा नासूर कर दी ये भला मरहम है क्या'

इस मिसरे को यूं कर लें:-

'जो दवा नासूर कर दे वो भला मरहम है क्या'

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