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तुम्हारा घोंसला

जैसे तुमने

तिनका तिनका जोड़ कर

धीरे-धीरे, बनाया अपना घोंसला

वैसे ही

तुमको देख-देख कर

बढ़ता रहा, मेरा भी हौसला

तुम एक- एक दाना चुग कर लायीं

अपने बच्चों को भोजन कराया

मैंने भी, वेसे ही खेतों में फसल लगायीं

दिन रात श्रम कर अन्न उगाया

धीरे धीरे रेत,बजरी ,सीमेंट ले आया

एक- एक ईंट जोड़कर

अपने सपनों का महल बनाया

जिस तरह तुमने अपने बच्चों को

उनके पैरों पर खड़ा किया

उड़ना सिखाया , उड़ा दिया, विदा किया  

मैंने भी अपनी बिटिया को

पढ़ा –लिखा कर बड़ा किया

तुम्हारी प्रेरणा दे ,उसको ससुराल, विदा किया

अब अपने घर में, मैंने रख लिया है

वो खाली पड़ा तुम्हारा घोंसला

जिसे देख-देख कर

रोज बढाता रहता हूँ

अपने जीवन जीने का हौसला !!

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 1251

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on November 28, 2014 at 10:16pm

आपका हार्दिक धन्यवाद नीरज मिश्र जी !

Comment by Neeraj Nishchal on November 28, 2014 at 8:41pm
बहुत खूबसूरत बधाई स्वीकारिये
Comment by Hari Prakash Dubey on November 27, 2014 at 9:59pm

आदरणीया सुश्री राजेश कुमारी जी आपने रचना पर ध्यान दिया और आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया पाकर में कृतार्थ हुआ ,आप जैसे विद्वानों के प्रोत्साहन से मनोबल बढ़ जाता है ,आपका हार्दिक आभार !!

Comment by Hari Prakash Dubey on November 27, 2014 at 9:51pm

आपकी आत्मीय प्रतिक्रिया एवं प्रोत्साहन के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय श्री गणेश जी "बागी" जी ,आशा है भविष्य मे भी आपका मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन मिलता रहेगा !सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 27, 2014 at 9:30pm

बहुत ही प्यारी रचना ...यही है जीवन हम लोगों का बस खाली घोंसला रह जाता है और बीते दिनों की याद में जीवन गुजर जाता है ,टूटते हुए जीवन को चाहे एक चिड़िया का घोंसला ही जीने का होंसला  दे. बहुत बहुत बधाई इस भावपूर्ण अभिव्यक्ति पर 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 27, 2014 at 9:12pm

वाह आदरणीय हरी प्रकाश जी, सुन्दर अभिव्यक्ति, रचना पसंद आयी, बधाई स्वीकार करें।

Comment by Hari Prakash Dubey on November 27, 2014 at 1:42pm

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय योगराज प्रभाकर जी।


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2014 at 12:49pm

बहुत खूब भाई हरिप्रकाश दुबे जी।

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