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कलियुग

उषा अवस्थी

ब्रह्मज्ञानी उपहास का पात्र है

अर्थार्थी सिर का ताज है 

किसको ,कब पटखनी दें? आँखें गड़ाए हैं

मिलते ही मौका, धूल में मिलाए हैं 

कलियुग है,चाहते अपनी वज़ाहत है

दूसरों को मारकर जीने की चाहत है

श्रमिकों की मेहनत का हक़, हक़ से लेते हैं 

जन्म-जन्मांतर पापों को ढोते हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Usha Awasthi on September 24, 2023 at 10:35pm

आदरणीय सुशील सरन जी,रचना पसन्द आने हेतु हार्दिक आभार आपका।

Comment by Sushil Sarna on September 24, 2023 at 8:56pm
वाह यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति आदरणीया जी

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