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तुम  कह   देती   एक  बार
प्राण! मुझ को, तुमसे प्यार।।
*
मिट जाती जन्मों की प्यास
छा   जाता  मन  में  उजास।
खो  जाते   सकल   संत्रास
पूरित  होती  स्वर्णिम आस।।
*
पीड़ा  हो  जाती तार - तार
तुम   कह   देती  एक  बार
प्राण! मुझ को, तुमसे प्यार।।
*
पोंछ देती तुम नयन गीले
पड़ जाते सब आबंध ढीले।
हो जोते हरित, सब पर्ण पीले
मृत्यु कहती , जा और जी ले।।
*
मन  से   लेती   जो  पुकार
तुम   कह   देती  एक  बार
प्राण! मुझ को, तुमसे प्यार।।
*
भाल पर चाहे अनगिन दाग
पथ पर  बिछी  आग - आग
लेकर कितने ही भाव पराग
अधर  गाते  फिर  प्रीत राग।।
*
पलकें  लेती  हर पथ बुहार
तुम   कह   देती  एक  बार
प्राण! मुझ को, तुमसे प्यार।।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 4, 2022 at 9:14am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गीत पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 4, 2022 at 9:13am

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गीत पर उपस्थिति, स्नेह व मार्गदर्शन के लिए आभार । 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 4, 2022 at 9:11am

आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। गीत पर आपकी उपस्थिति और अनुमोदन से उत्साह बढ़ा है। स्नेह के लिए आभार।

Comment by Samar kabeer on September 23, 2022 at 7:32pm

ख़जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर जी आदाब, अच्चा गीत रचा आपने, बधाई स्वीकार करें I 

Comment by Chetan Prakash on September 23, 2022 at 9:34am
  1. नमस्कार, 'मुसाफ़िर' साहब गीत का अच्छा प्रयास किया आपने! मैं आपका पहला गीत देख रहा हूँ, बधाई  ! हाँ, लेकिन गीत किसी मीटर / तय प्रबंधन पर ही रचे जाते है, नवगीत की बात यहाँ मैं नहीं कर रहा हूँ! आपके स्थायी में मात्राओं की संख्या कुछ और है, जबकि अन्तरों में मात्रा संख्या बदल गयी है, देखिएगा! अत : लय भी बाधित हुईं हैं, यथा, " पड़ जाते सब आबंध ढीले"   ! सादर! 
Comment by Ashok Kumar Raktale on September 22, 2022 at 10:44pm

 सच है जीवन में उल्लास हो तो मृत्यु भय भी दूर-दूर भागता है. उसी उल्लास को पाने की चाहत में सुन्दर गीत रचा है आपने आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर

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