For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

खत तुम्हारे नाम का.. लिफाफा बेपता रहा // सौरभ

२१२ १२१२ १२१२ १२१२ 

  
चाहता रहा उसे मगर न बोल पा रहा
उम्र बीतती रही मलाल सालता रहा
 
जिंदगी की दोपहर अगर-मगर में रह गयी
साँझ की ढलान पर किसे पुकारता रहा ?
 
बाद मुद्दतों दिखा, हवा तलक सिहर गयी  
मन गया कहाँ-कहाँ, मैं बस वहीं खड़ा रहा
 
आयी और छू गयी कि ये गयी, कि वो गयी
मैं इधर हवा-छुआ खुमार में पड़ा रहा
 
रौशनी से लिख रखा है खुश्बुओं में डूब कर
खत तुम्हारे नाम का.. लिफाफा बेपता रहा !
 
बादलो, इधर न आ मुझे न चाहिए नमी
आग जो सुलग रही उसे अभी बढ़ा रहा..
 
यार मेरा चाँद है व शुक्ल का हूँ पक्ष मैं .. 
किंतु अपने भाल का वो दाग क्यों दिखा रहा ?
***
सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)
 

Views: 1070

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 29, 2022 at 11:59am

भाइयो, जुट जाओ/ भाइयो, जुट जा.. 

तकनीकी रूप से उपर्युक्त दोनों वाक्य समूहवाचक संज्ञा के एकवचन इकाई के दो भिन्न प्रारूप हैं.

जब आत्मीयता का स्तर प्रगाढ़ होता है तो सम्बोधन का तुम से तू हो जाना एक सम्बोधन-भाव है. 

संस्कृत के व्याकरण के अनुसार अकारान्त नपुंसकलिंग के बहुवचन के तीन प्रारूप होते हैं. उस हिसाब से बहुवचन में बादलानि या मेघानि किया जा सकता है लेकिन हिन्दी में ऐसी व्यवस्था या चलन नहीं है. सो, बादल समूहवाचक एकवचन संज्ञा में बादल ही रहेगा. और, सम्बोधन में बादलो ही आयेगा. 

आपने सही कहा, आदरणीय. ओबीओ के मंच पर सीखने की जैसी और जितनी सहूलियत है, वह बिरले उपलब्ध हो पाती है. और, आपस में बतिया-बतिया कर हम कई-कई बिन्दुओं पर चर्चा कर डालते हैं. बशर्ते, अनावश्यक और आवश्यक का भेद स्पष्ट बना रहे. 

शुभ-शुभ

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 29, 2022 at 11:31am

आदरणीय, चूंकि ओ बी ओ एक सीखने-सिखाने का मंच है, केवल इसलिये मैंने आपका ध्यान इस ओर इंगित किया जाना ज़रूरी समझा था, जैसा कि इस मंच की परंपरा है। 

आप जैसे वरिष्ठ सदस्य जो मानक मंच पर स्थापित करते हैं हम जैसे सीखने वाले उस को नियम और विधान के स्तर पर स्वीकार कर अंगीकार कर लेते हैं। आपने समूह वाचक संज्ञा का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया है - 

भाइयो, जुट जाओ ! .. आदरणीय मेरी जिज्ञासा है कि क्या इसे... 

भाइयो, जुट जा ! भी कह सकते हैं? या फिर, 'भाइयो, जुट जाओ' ही कहना श्रेयस्कर होगा... यदि हाँ तो... 'बादलो, इधर न आओ' जैसा कुछ कहना ही उचित होगा। आशा है मैं अपनी बात पहुँचा सका हूँ। सादर। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 29, 2022 at 8:32am

आदरणीय लक्ष्मण भाईजी, प्रस्तुति को आपसे मिले अनुमोदन से अभिभूत हूँ. 

हार्दिक धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 29, 2022 at 8:29am

आदरणीय, आपकी चिंता जायज है. लेकिन 'रुको जरा..' भी तो उस लिहाज से एकवचन को संबोधित क्रिया हो गयी न ? जबकि, जैसा आपने कहा, कि बादल की संज्ञा यहाँ बहुवचन है. फिर तो ऐसे में 'बादलो, रुकें जरा..' कहना होगा.

खैर, अब मैं व्याकरण और भाषाई चलन पर आता हूँ. 

जब कोई समूहवाचक संज्ञा एक इकाई की तरह प्रयुक्त होती है, तो उससे सम्बन्धित संबोधन और क्रिया एकवचन में ही नियोजित होती हैं.

कुछेक उदाहरण देखें,

पूरी कौम सुन ले !

भाइयो, जुट जाओ ! .. आदि

इसी क्रम में, बादलो, इधर न आ.. 

विश्वास है, व्याकरण और भाषाई चलन सम्बन्धी तथ्य को मैं अपेक्षानुरूप स्पष्ट कर पाया. 

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 28, 2022 at 8:23pm

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। लम्बे अंतराल पर आपकी मनभावन रचना पढ़कर मन हर्षित हुआ। हार्दिक बधाई।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 28, 2022 at 4:21pm

आदरणीय मेरा इशारा वाक्य विन्यास की ओर था,

बादलो, इधर न आ.... या बादलो रुको ज़रा... दोनों में ही आग्रह है।

परन्तु ध्यातव्य है कि 'बादलो, इधर न आ' में बदलो बहुवचन है जबकि आग्रह (इधर न आ) किसी एक से किया गया है। सादर। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 28, 2022 at 11:21am

उत्साहवर्द्धन के लिए आपका सादर धन्यवाद, आदरणीय अमीरुद्दीन ’अमीर’ बागपतवी जी. 

आपको कहे गये अश’आर अच्छे लगे, इससे मन अभिभूत है. 

बादलो, रुको जरा.. 

आदरणीय, मैं अदना कौन होता हूँ, बादलों की प्रकृति और उनके कार्य में दखल देने वाला ? वे तो प्राकृतिक रूप से घुमंतू हैं. चाहे जहाँ आएँ-जाएँ. मेरे जैसे तो बस उनसे निवेदन कर सकते हैं. नम्र आग्रह कर सकते हैं कि वे चाहे जहाँ जाएँ, मेरी तरफ न आएँ. 

विश्वास है, बादलों से हुआ मेरा निवेदन अब उचित प्रतीत हो रहा होगा. 

पुनः, हार्दिक धन्यवाद 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 28, 2022 at 9:31am

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी आदाब, हज़ज मुरब्बा अश्तर मक़्बूज़ बह्र, अरकान- (फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन) में कही गई ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है, हार्दिक बधाई स्वीकार करें। 

'बादलो, इधर न आ'... बादलो रुको ज़रा। सादर। 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
4 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।संबंधों को निभा रहे, जैसे हो दस्तूर…See More
18 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
yesterday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आजकल खूब हो रहा है ये चलन और कभी कभी विवाद भी। आपकी चिरपरिचित शैली में विचारोत्तेजक लघुकथा। बधाई…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service