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जिसकी आदत है घाव देने की - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२ १२१२ २२

बल रहित मैं हूँ  भीम कहता है
तुच्छ खुद को असीम कहता है/१
*
जिसकी आदत है घाव देने की
वो स्वयम को हकीम कहता है/२
*
आम पीपल  को  भूल बैठा वो
और कीकर को नीम कहता है/३
*
राम से जो गुरेज उस को नित
क्यों तू खुद को रहीम कहता है/४
*
धर्म क्या है समझ  न पाया जो
धर्म को  वो  अफीम  कहता है/५
*
हाथ जिसका है कत्ल में या रब
वो भी खुद को नदीम कहता है/६
*
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2021 at 10:57pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2021 at 10:56pm

आ. भाई चेतन जी, गजल पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन व सुझाव के लिए हार्दिक धन्यवाद । बदलाव का प्रयास करता हूँ। 

Comment by TEJ VEER SINGH on December 5, 2021 at 12:16pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मुसाफ़िर जी।बहुत सुन्दर ग़ज़ल।

Comment by Chetan Prakash on November 30, 2021 at 7:51pm

आदाब, भाई  लक्ष्मण सिंह मुसाफिर बहुत खूबसूरत लेकिन छोटी  ग़ज़ल  कही आपने ! बधाई  स्वीकार  करें  ! चौथे  शे'र  में, भाई जी, मुझे रब्त  की क़ी जान पड़ी ! देखिएगा  !

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