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ग़ज़ल नूर की- तुम्हें लगता है रस्ता जानता हूँ

तुम्हें लगता है रस्ता जानता हूँ
मगर मैं सिर्फ चलना जानता हूँ.
.

तेरे हर मूड को परखा है मैंने
तुझे तुझ से ज़ियादा जानता हूँ.
.

गले मिलकर वो ख़ंजर घोंप देगा
ज़माने का इरादा जानता हूँ.
.

मैं उतरा अपने ही दिल में तो पाया  
अभी ख़ुद को ज़रा सा जानता हूँ.
.

बहा लायी है सदियों की रवानी
मगर अपना किनारा जानता हूँ.
.

बता कुछ भी कभी माँगा है तुझ से?
मैं अपना घर चलाना जानता हूँ.      
.
निलेश "नूर" 
मौलिक / अप्रकाशित 

Views: 657

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 11, 2020 at 11:26am

शुक्रिया आ. जवाहर लाल जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 11, 2020 at 11:26am

शुक्रिया आ. लक्ष्मण जी 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 10, 2020 at 2:06pm

मैं उतरा अपने ही दिल में तो पाया  
अभी ख़ुद को ज़रा सा जानता हूँ.

आदरणीय नीलेश जी, यों तो सभी शेर अच्छे हैं पर मुझे जो ससे अच्छे लगी उसे मैंने ऊपर इंगित कर दिया है. बहुत बहुत बधाई!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 1, 2020 at 2:11pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 1, 2020 at 12:17pm

धन्यवाद आ. समर सर 

Comment by Samar kabeer on October 1, 2020 at 11:57am

जनाब निलेश 'नूर' जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 1, 2020 at 11:21am

धन्यवाद आ. आशीष जी 

Comment by आशीष यादव on October 1, 2020 at 4:20am

आदरणीय श्री निलेश 'नूर' सर, बेहतरीन ग़ज़ल हुई है। बधाई स्वीकार कीजिए।

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