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आज पर कुछ दोहे :

आज पर कुछ दोहे :

झूठ सरासर भूख से, तन बनता बाज़ार।
उजले बंगलों में चलें, कोठे कई हजार।।

नज़रें मंडी हो गईं, नज़र बनी बाज़ार।
नज़र नज़र में बिक गया, एक तन कई बार।।

नज़रों में है प्यार का, झूठ भरा संसार।
प्यार ओट में वासना, का होता व्यापार।।

कलियों का तन नोचतीं, वहशी नज़रें आज।
रक्षक भक्षक बन गए, लज्जित हुआ समाज।।


हुई पुरातन सभ्यता, नव युग हुआ महान।
बेशर्मी पर आज का, गर्व करे इंसान।।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on August 11, 2020 at 5:55pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय कम्प्यूटर ठीक न होने के कारण प्रत्युतर में विलम्ब हुआ, दिल से क्षमा चाहूँगा।

Comment by Sushil Sarna on August 11, 2020 at 5:54pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिजी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय कम्प्यूटर ठीक न होने के कारण प्रत्युतर में विलम्ब हुआ, दिल से क्षमा चाहूँगा।

Comment by नाथ सोनांचली on July 11, 2020 at 12:48pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बढ़िया दोहे सृजित किये हैं । बधाई स्वीकार कीजिए

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 7, 2020 at 1:42pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । उत्तम दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।

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