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Prabhakar Pandey's Blog (12)

विराम-चिह्न की आत्मकथा

 

विराम-चिह्न की आत्मकहानी, सुनें उसी की जुबानी ।

 

मैं विराम-चिह्न हूँ। कुछ विद्वान मुझे विराम चिन्ह या विराम भी बोलते हैं लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है। हाँ, एक बात मैं…

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Added by Prabhakar Pandey on November 24, 2011 at 3:30pm — 3 Comments

गोटी चम किसकी यानि दसों उँगलियाँ घी मे किसकी

सादर नमस्कार,



ये लेख मैंने मुंबई आतंकी हमले के तुरंत बाद लिखी थी। चाहता हूँ कि इ लेख के माध्यम से अपने विचार आप लोगों के साथ भी बाँटूँ। आप भी अपने विचारों से हमें अवगत कराने की कृपा करें। सादर धन्यवाद।।



बाबूजी मुंबई से आए हैं और बहुत उदास हैं। कह रहे हैं कि छोटा-मोटा काम अपने गाँव-जवार में ही मिल जाएगा तो करूँगा पर अब मुंबई नहीं जाऊँगा। अब वहाँ के जीवन का कोई भरोसा नहीं है, कब क्या हो जाएगा कोई नहीं जानता। अब तो पूरे भारत में आतंकवाद ने अपना पैर पसार लिया है। इन सब… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 20, 2010 at 11:08am — 3 Comments

हक ???

मुझे भी हक है

कुछ भी करूँ.

दूँ सबको दुख-दर्द

या करुँ किसी का कत्ल.

सबको मारूँ,

लाशों की ढेर पर नाचूँ,

देखकर मेरा मृत्युताण्डव,

काँप जाएँ,भाग जाएँ,

मौत का खेल खेलनेवाले दानव.

मुझे भी हक है

दूँ सबको गाली,

हो जाएँ

अपशब्द की पुस्तकें खाली.

ना देखूँ मैं,

माँ,बहन,भाई,

लगूँ मैं कसाई.

देखकर मेरा ऐसा रंग,

मर जाए मानवता,भाईचारा

और प्रेम का तन.

जब मैं ऐसा हो जाऊँगा,

थर्रा जाएँगे,

अपशब्द बोलने…
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Added by Prabhakar Pandey on July 12, 2010 at 2:18pm — 4 Comments

नौ की महत्ता - इति सिद्धम्

महानुभावों "नौ" की महत्ता तो जगजाहिर है ।

यह सबसे बड़ा अंक है । (० से ९)

नौ का गुणनफल करने पर भी प्राप्त संख्या के

अंकों का योग नौ ही होता है । जैसे- अठारह (१+८=९),

सत्ताईस (२+७=९),छत्तीस (३+६=९),पैंतालिस (४+५=९),

चौवन (५+४=९),तिरसठ (६+३=९),बहत्तर (७+२=९),

एकासी (८+१=९),नब्बे (९+०=९) ..........जहाँ तक जाएँगे...वहाँ तक...(९०+९=९९= ९+९=१८= ९)..........अनंत......



नौ की महत्ता को प्रतिपादित करती हैं ये मेरी पंक्तियाँ -



राम के नाम को…
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Added by Prabhakar Pandey on July 10, 2010 at 5:26pm — 2 Comments

दुनिया (लोककथा)

एक लड़का था । बचपन में ही उसके माता-पिता गुजर गए । उसका लालन-पालन उसके नाना ने किया । लड़का अभी आठ-नौ साल का था तभी उसपर दुनिया देखने का भूत सवार हो गया । वह बार-बार अपने नाना से कहता कि मैं दुनिया देखना चाहता हूँ ? नाना समझाते कि बेटा अभी तो तुम्हारे पास बहुत समय है, जब तू बड़ा होगा, दुनियादारी में लगेगा तो तूझे खुद मालूम हो जाएगा कि दुनिया क्या है ? पर लड़का अपने नाना की एक न सुनता और बार-बार दुनिया देखने की रट लगाता ।

एक दिन लड़के के नाना ने कहा, "चलो आज मैं तुमको दुनिया दिखाता हूँ" ।… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 9, 2010 at 10:08am — 4 Comments

योगिराज देवरहा बाबा

योगिराज देवरहा बाबा :- देवरिया सुप्रसिद्ध संत ब्रह्मर्षि योगिराज देवरहा बाबा की कर्मस्थली रह चुकी है । देवरिया क्षेत्र की जनता हार्दिक रूप से शुक्रगुजार है उस परम मनीषी, योगी की जो देवरिया क्षेत्र को अपना निवास बनाया, इस क्षेत्र की मिट्टी को अपने पावन चरणों से पवित्र किया और अपने ज्ञान एवं योग की वर्षा से श्रद्धालु जनमानस को सराबोर किया । इस योगी की कृपा से देवरिया जनपद विश्वपटल पर छा गया । देवरहा बाबा ब्रह्म में विलीन हो गए लेकिन उनके ईश्वरी गुणों की… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 7, 2010 at 3:37pm — 1 Comment

हाँ! मैं हूँ परमेश्वर.

हाँ! मैं हूँ परमेश्वर.

मैं बन बैठा भगवान,

मंदिर में,सबके दिल में.

गाँव-गाँव व शहर-शहर,

मैं घूमता रहा पहर-पहर,

चंदे के लिए,मंदिर के वास्ते,

मिल गए मुझे भाग्य के रास्ते.

सुबह निकलता बिना नहाए-खाए,

लंबा चंदन टीका करता,

कंधे में झोला लटकाता,

लगता पंडित भोला-भाला.

मंदिर के नाम की रसीद

हाथ में रहती,कटती रहती,

मैं घूमता रहता,काटता रहता,

अपने अभाग्य को,रसीद के साथ.

लोग चंदे के साथ भोजन भी कराते,

रात को हम वहीं भरते… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 7, 2010 at 10:52am — 3 Comments

विज्ञान ??? ईश्वर !!! (व्यंग्य-रचना)

प्रभु ! तू बता अपनी

सच्चाई,

क्योंकि,तू अब नहीं बचेगा,

देख,मनुष्य ने ली है

अंगड़ाई.

क्या तू है ?

तेरा अस्तित्व है ?

देख,

विज्ञान आ गया है,

तेरा अस्तित्व,

हटा गया है.

तू खुद सोच,

मनुष्य लगाता है,

तेरे कार्यों में अड़चन,

वह तेरा करता है खंडन.

वह खुद ही लगा है,

बनाने,बिगाड़ने

सपनों को,अपनों को.

वह खुद ही बन बैठा है

भगवान ?

अगर तू है तो रुका क्यों है,

भाग जा,

जा ग्रहों पर छिप… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 5, 2010 at 6:00pm — 3 Comments

भोजन क्या खाएँ क्या नहीं (महीनेवार विवरण)

प्रस्तुत पदों के रचयिताओं का नाम मुझे पता नहीं है. ये पद मेरे दादाजी सुनाया करते हैं.



1.



इस पद में यह बताया गया है कि किस माह में क्या खाना अच्छा होता है-



कातिक मूली , अगहन तेल,

पूष में करे दूध से मेल,

माघ मास घी खिचड़ खा,

फागुन उठ के प्रात नहा,

चइत (चैत्र) माह में नीम बेसहनी,

बैसाख में खाय जड़हनी,

और जेठ मास जे दिन में सोए,

ओकर जर (बुखार) असार में रोवे.

(भावार्थ-ऐसे व्यक्ति को बिमारी नहीं होती)



2.



इस… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 5, 2010 at 2:10pm — 3 Comments

कवि घाघ और उनकी बहू के बीच परिसंवाद

उत्तर भारत में घाघ नामक एक बहुत प्रसिद्ध किसानी कवि हुए थे.

उनकी रचनाएँ आज भी ग्रामीणों द्वारा कही-सुनी जाती हैं.

उनकी बहू भी बहुत बुद्धिमान थीं.

नीचे की संकलित रचनाओं में उनके परिसंवाद हैं :-



1.

घाघ कहते हैं :-



पउआ पहिन के हर जोते,

सुथनी पहिन के निरावे,

कहें घाघ उ तीनों भकुआ,

सिर बोझा ले गावे.



घाघ की बहू कहती हैं :-



अहिरा हो के हर जोते,

तुरहिन हो के निरावे,

छैला होके कस न गावे,

हलुक बोझा जो… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 2, 2010 at 3:24pm — 4 Comments

सभ्यता की पहचान

दिन,प्रतिदिन,

हर एक पल,

हमारी सभ्यता और संस्कृति में

निखार आ रहा है,

हम हो गए हैं,

कितने सभ्य,

कौआ यह गीत गा रहा है.

पहले बहुत पहले,

जब हम इतने सभ्य नहीं थे,

चारों तरफ थी खुशहाली,

लोगों का मिलजुलकर,

विचरण था जारी,

जितना पाते,

प्रेम से खाते,

दोस्तों पाहुनों को खिलाते,

कभी-कभी भूखे सो जाते.

आज जब हम सभ्य हो गए हैं,

देखते नहीं,

दूसरे की रोटी,

छिनकर खा रहे हैं,

और अपनों से कहते हैं,

छिन…
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Added by Prabhakar Pandey on July 2, 2010 at 3:16pm — 4 Comments

भोजपुरिया लाल : भारत रत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद

सदियों से भोजपुरिया माटी की एक अलग पहचान रही है। इस माटी ने केवल भोजपुरी समाज को ही नहीं अपितु माँ भारती को ऐसे-ऐसे लाल दिए जिन्होंने भारतीय समाज को हर एक क्षेत्र में एक नई दिशा एवं ऊँचाई दी एवं विश्व स्तर पर माँ भारती के परचम को लहराया। भोजपुरिया माटी की सोंधी सुगंध से सराबोर ये महापुरुष केवल भारत का ही नहीं अपितु विश्व का मार्गदर्शन किए और एक सभ्य एवं शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। यह वोही भोजपुरिया माटी है जिसको संत कबीर ने अपने विलक्षणपन से तो शांति, सादगी एवं राष्ट्र के… Continue

Added by Prabhakar Pandey on June 14, 2010 at 1:25pm — 7 Comments

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