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Akhand Gahmari's Blog (81)

दर्द (तीन मुक्‍तक)

(1)

 

दर्द ए दिल से पहचान यारो मेरी बहुत पुरानी है

आँखो के अश्‍को की यारो देखो अलग कहानी है

थे पास जब वो मेरे जीवन की अलग रवानी थी

नहीं आयेगी जीवन में बीती शाम जो सुहानी है

 

(2)

मेरे भी दर्द ए दिल को काश कोई  जान लेता

आँखो में छुपे अश्‍को को भी काश जान लेता

कितना दर्द यारो हमें बिछुडने का अपनो से

मेरे दर्द भरे शब्‍दे से ही काश कोई जान लेता

 

(3)

किसने किसको दर्द दिया  ना जान पाया मैं

कैसे…

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Added by Akhand Gahmari on December 25, 2013 at 11:00pm — 18 Comments

चुपके से

कल तक थी जाने कहाँ

आज आ रही है पास वो

देख नहीं पाये जो

जीवन के रंगों को

ले रही उन्‍हें भी

अपने आगेाश में वो

ना सुना नाम कभी

ना जाना पहचान ही

चुपके से चली आयी वो

तोड़ने उनकी सॉसे को

इल्‍जाम कभी लेती नहीं

अपने दामन पर वो कभी

है इल्‍जाम उनहीं पे

खत्‍म करती जिसका

जीवन वो

जीवन में नहीं रंग उतने

नाम उनका उतना हैं

आ जाती है चुपके से वो

जाने कब जीवन…

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Added by Akhand Gahmari on December 25, 2013 at 11:00am — 14 Comments

दो अक्षरो का *शक'

दो हमसफर

एक छत

रहे अजनबी की तरह

लब खुले तो टकरार

ना साँसे टकराती

ना बिन्‍दीयाँ भाती

ना विदाई

ना स्‍वागत

नजर चुराते

बीती राते

कभी

तन मन साथ

हँसी उमंग चाहत प्‍यार

लगी नजर

बने नदी के

दो किनारे

बीच में

शक

केवल शक

बाँट दिया प्‍यार

एक ना सुनते

एक दूजे की बाते

स्‍वाभिमान

विद्रोह

गुस्‍से की

ज्‍वाला जला रही

प्‍यार…

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Added by Akhand Gahmari on December 21, 2013 at 7:55pm — 12 Comments

मेरा श्रृंगार

मन अशांत चेहरा शान्‍त

आँखे शुन्‍य में निहारती

चारो तरफ था शोर था

मेरी गोद में सोया

मेरा सुहाग था

जीवन का उजाला

बच्‍चों का पालक

मेरा साहस मेरा श्रृंगार था

आज बीमार था

यहाँ मौत से थी जंग

वहाँ हड़तालियों की

वार्ता सरकार के संग

रोके थे गाड़ीयों के पहिये

आवाज साथीयों साथ रहीये

आती थी हिचिकियाँ बार बार

मौत का मौन निमंन्‍त्रण

मैं लाचार,कैसे चले पहीये

मेरा बच्‍चा जो चुप…

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Added by Akhand Gahmari on December 15, 2013 at 9:00pm — 7 Comments

वही कल वही आज

है वही रास्‍ते 

पथरीले चौड़े

पतले पक्‍के

घट गये रास्‍ते

बढ़ गयी दूरियाँ

 है वही गिलास

शरबतों से भरे

शराब से खाली

नशा प्‍यार का

नशा नशा का

दरवाजों पे दरबार

मन की शांति

मन का तनाव

भूला प्‍यार

बचा टकरार

वही है  रिश्‍ते

निभाने की होड़

दिखावट की होड़

मदद चाहत

मदद डर

प्रेम है वहीं

मन का मिलन

तन का मिलन

समर्पित  हम

धन…

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Added by Akhand Gahmari on December 11, 2013 at 9:00pm — 13 Comments

एक किसान

मौसम के

सहारे वह

अरमान सजाता

जीवन का

दिन रात ना समझे वह तो

एहसास,ना वर्षा,ना ठंड का

कमर तोड़ मेहनत पर भी

ना मिलता उसे निवाला था।

खाद बीज महँगा अब तो

पानी भी ना देता संग था।

कर्ज में डूब कर भी वह

करता पूरे कर्म था।

तब जीवनदायक

अनाज का दाना

आता उसके घर था।

बड़े अरमान इसी दाने पर

हाथ पीले बेटी के 

बदले मेहर की वह

तन दिखाती साड़ी को

जीवन की है और जरूरत

महीनो तक मुँह का निवाला

कर्ज निवारण इसी दाने…

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Added by Akhand Gahmari on December 2, 2013 at 12:13am — 8 Comments

भरोसा

ऑंखो  में था जो

सपना गुम हुआ,

वफा की राह

टूटा वह 

मैं बिखर गया

है भरोसा प्‍यार पर

तेरे हमें इस कदर

वेवफा नहीं कहूँगा

कभी मेरे जानेजिगर

मेरी ही चाहत

में रही शायद

कमी होगी

नहीं याद करती

दूर हो  चली,

चली थी बनने

जो कभी मेरा हमसफर।

जब रोया मैं याद कर

उसके तराने को

अश्‍क सुखाये मेरे

दिल की जलन ने

पी गये बंद ओठ 

यादों के अश्‍क को।

खुले ओंठ तो…

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Added by Akhand Gahmari on November 30, 2013 at 4:30pm — 8 Comments

दिल की बात

दूर बैठे थे उनसे कभी हम आज कितने करीब आ गये

दिल ने किया कब दिल से बाते इससे अंजान  हो गये

बातो ही बातो हम एक दूजे की नजरो में खो गये

मगर लगी जो नजर प्‍यार पर एक दूजे से दूर हो गये

कभी अपने लगते थें जो रास्‍ते आज बेगाने हो गये



किसकी जुबान से निकला क्‍या हम ढूढ़ते रह गये

चॉंद ढ़ले तक करते बात जो अब चॉंद निकलते सो गये

एक झलक पाये उनका अब लगता वर्षो हो गये

एक ही तो प्‍यार था मेरा वो जाने कहॉं अब खो गये

कभी अपने लगते थे जो रास्‍ते आज बेगाने…

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Added by Akhand Gahmari on November 24, 2013 at 11:38am — 8 Comments

1 अरब का गौरव है भारत रत्‍न

भारत रत्‍न केवल एक पुरस्‍कार ही नहीं है वह भारत का सम्‍मान है और 1 अरब भारतीयों का मान है,भारत रत्‍न। 1954 से प्रारम्‍भ हुए भारत रत्‍न के बारे में साफ लिखा है कि भारत रत्‍न, कला, विज्ञान, साहित्‍य एवं समाजसेवा के क्षेत्र में उत्‍कृष्‍ट कार्य करने वाले को प्रदान किया जाता है।  भारत रत्‍न जिसको भी मिला वह कम या अधिक सभी हकदार थे। मगर सचिन रमेश…

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Added by Akhand Gahmari on November 20, 2013 at 1:30pm — 6 Comments

भारत रत्‍न, अखंड गहमरी

लाल लहू से अपने जिसने,देश की धरती कर दिया

नित्‍य नई खोजों में,जीवन के सुख छोड दिया

वेा भारत का  वीर सपूत,गुमनामी में खो गया

देश को दे कर नये आयाम वेा बेनाम हो गया

शिकार राजनीति का, भारत रत्‍न हो गया।

 

ध्‍यानचंद जैसा जादूगर, आज बेनाम हो गया

विदेशी धरती पर जो हुआ विजेता, कपिल गुम हो

खेलों के  कितने मसीहा का दीपक अब बुझ गया

रत्‍नो के रत्‍न  कितने,वो गुमनामी में खो गया

शिकार राजनीति का भारत रत्‍न होगया।

 

आजादी…

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Added by Akhand Gahmari on November 18, 2013 at 9:00pm — 7 Comments

मॉं :::अखंड गहमरी

मॉं

एक शब्‍द

एक संबोधन

एक रिश्‍ता

क्‍या हैं,मॉं

नहीं समझ पाया

नहीं जान पाया

नीमअंधकार से निकला मैं

खुली पलकें

मखमली गोद में

सिर पर स्‍नेह की छाया

सीने से लग कर

क्षुधार्त की शांति

क्‍या यही हैं मॉं

या मॉं हैं

हाड़ मॉंस की एक पुतली

जिसके अनेकों रूप

जाने अंजाने कितने

बेटी,बहन,बहू पत्‍नी

आसानी से बनते रिश्‍ते

मगर मॉं

दिर्घावधि…

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Added by Akhand Gahmari on November 17, 2013 at 11:39am — 7 Comments

मेरा वजूद

बात एक रात की,

मैं था सोया

मीठे सपनो में खोया

तभी सपनो में आयी

एक सुन्‍दर नारी

दमकता चेहरा पर उदास

उज्‍जवल वस्‍त्र पर गंदे

कीचड में सने

मैं इर कर कॉंप…

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Added by Akhand Gahmari on November 13, 2013 at 4:10pm — 3 Comments

क्‍या है प्रेम, अखंड गहमरी

क्‍या है प्रेम,
पूछते रह गये।
क्‍या हैं प्रेम,
सोचते रहे गये।
क्‍या है ,परिभाषा प्रेम की,
 खोजते रह…
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Added by Akhand Gahmari on November 13, 2013 at 2:29pm — 7 Comments

मेरा प्रश्‍न ---अखंड गहमरी की प्रस्‍तुति

वक्‍त की मारी नहीं मैं,

हालत की मारी नहीं मैं,

जिन्‍दगी से घबराई नहीं मैं

शिकार हूँ दुश्‍कर्म की ,

जि‍न्‍दगी से हारी नहीं मैं।

अवला नहीं मैं 

जो सहूँ जुल्‍मो सितम केा

आज की नारी हूँ,

बदल दूँगी जमाने को,

जमाने की सोच केा

अपनी जिंन्‍दगी केा

क्‍योंकि मैं आज की नारी हूँ

जिन्‍दगी से हारी नहीं हूँ।

मेरा क्‍या हुआ,

सम्‍मान गया

नहीं।

बेनकाब हो गया

चेहरा मानव समाज का

सल्‍तनत…

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Added by Akhand Gahmari on November 11, 2013 at 7:30pm — 7 Comments

आत्‍ममंथन

''आत्‍महत्‍या''

क्‍या है ये।

क्‍यों हो रही है ये,

क्‍यों भागते है वे,

जिन्‍दगी से,

कर्तव्‍यों से,  

क्‍यों नहीं सामना करते

कठिनाईयों का,

समस्‍याओं का,

परिस्थितों का,

किस के दम पर

छोड जाते है वे 

बूढे मॉं -बाप को,  

अवोध बालको केा,

अपनी विवाहिता केा

जिसका संसार बदल दिये वे

एक चुटकी सिन्‍दूर से

क्‍या कसूर है इनका

यही , वे करते है

प्‍यार उनसे

चाहते है…

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Added by Akhand Gahmari on November 7, 2013 at 5:49pm — 13 Comments

आईना

जाने को तैयार ससुराल मैं,
देख रहा था आर्इना बार बार मैं।
सूझी तभी हमें  शरारत,
आइने से बोल पडा।
बता मेरे यार कैसा लग रहा मैं,…
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Added by Akhand Gahmari on October 31, 2013 at 8:00pm — 8 Comments

सकून के दो पल

दहकती ज्‍वाला,
तेज प्रकाश
जग को,हमकेा,आपकेा
सबकेा देता उजाला है
मगर बिल्‍कुल तन्‍हा
बिल्‍कुल…
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Added by Akhand Gahmari on October 29, 2013 at 9:29pm — 7 Comments

एक शब्‍द

वो कहते हैं

शब्‍द र्निजीव होते है,

बेजुबान होते है।

वो कहते है,

यह लेखनी से बने,

आकार भर है।

जुबान से निकली,

आवाज भर है।

ना इनकी पहचान है,

ना इनका अस्तिव।

मगर यारो शब्‍द तो शब्‍द हैं,

अक्षरों केा संगठित कर

खुद में समाहित कर,

वाक्‍य बना कर उसे

पहचान देते है।

और खुद गुमनामी के

अँधेरे में खो जाते है।

ये शब्‍द निस्वार्थ सेवा का

एक सच्‍चा उदाहरण है।

एक शब्‍द झकझोर…

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Added by Akhand Gahmari on October 28, 2013 at 7:30pm — 5 Comments

कवि की चाहत

सूरज की तपिश,

चॅाद की शीतलता,

फूलों की महक,

शब्‍दों से खुशी,

शब्‍दो से रास्‍ते,

दिखाता एक कवि है,

शब्‍दो केा माले में पिरोता,

एक कवि है,

फिर भी गुमनामी की जिन्‍दगी…

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Added by Akhand Gahmari on October 27, 2013 at 10:00am — 6 Comments

प्रतिबिंम्‍ब

चॉदनी रात में

खुले आसमान में

विचरण करते चॉंद को देख रहा था

कितना निश्‍चल कितना शांत

चला जा रहा है अपने रस्‍ते

पर प्रकाश से प्रकाशमान पर

ना ईष्‍या ना कुंठा,ना हिनता

प्रकाश दाता के अस्‍त पर

बन कर प्रतिबिम्‍ब उसका

अंधेरे को दूर कर उजाले के

लिये सदैव प्रत्‍यनशील

भले रोक ले आवारा बादल

उसका रास्‍ता

छुपा ले प्रकाश उसका

मगर फिर भी प्रत्‍यन कर

बादलो से निकल कर

पुन: धरती को, अंबंर को, मानव को…

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Added by Akhand Gahmari on October 26, 2013 at 10:30am — 6 Comments

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